कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextइन्द्रमती अरु सकल हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥
चलत हंस सब अस्तुति लावें । अब तो दरस पुरुषको पावें ॥
तब हम पुरुषाहिं बिनती लावा । देहु दरस अब हंस ढिग आवा ॥
देहु दरस तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥
बिकस्यो पुहुप उठा अस बानी । सुनहु जोगसँतायन ज्ञानी ॥
हंसन कहैं अब आव लिवाई । दरस कराइ लेउ तुम आई ॥
छंद-हमचलि आयेउ हंस लग तब, हंस सकलो ले गयो ॥
पुरुष दरसन पाय सब हंसा, रूप सोभा तब भयो ॥
करहिं सु दंडवत हंस सबहीं, पुरुष पहुँ चित लाइया ।
पुरुष अमि फल तब चार दीन्हों, हंस सब मिलि पाइया ॥
सोरठा-जस रविके परकास, दरस पाय पंकज खुलै ।
तैसे हंस विलास, जनम जनम दुख मिटि गयो ॥
इन्द्रमती का लोक में पहुँचकर पुरुष और करुणामय को एकही रूपमें देखकर चकित होना ।
पुरुष कान्ति सब देखउ रानी । अद्भुत अमी सुधाकी खानी ॥
गदगद होय चरन लपटानी । हंस सुबुद्धि सुजन गुनखानी ॥
दीनो सीस हाथ जीव मूला । रवि प्रकाश जिमि पंकज फूला ॥
इन्द्रमती बचन ।
कहरानी तुम धन करुणामय । जिव भ्रम मेटि आनि यहि ठामय ॥
पुरुष बचन ।
कहा पुरुष रानी समझायी । करुणामय कहैं आनु बुलायी ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
नारि धाय आई मो पास । महिमा देखि चकित भौ दासा ॥
इन्द्रमती बचन ।
कह रानी यह अचरज आही । भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥
जो कछु कला पुरुष कहैं देखा । करुणामय तन एक विसेखा ॥
धाय चरन गह हंस सुजाना । हे प्रभु तव चरित्र सब जाना ॥
तुम सतपुरुष दास कहलाये । यह सोभा कस उहां छिपाये ॥
मोरे चित यह निश्चय आई । तुमहिं पुरुष दूजा नहिं भाई ॥
सो मैं आय देख यह ठाई । धन समर्थ मुहिं लिया जगाई ॥