भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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यमदूत वचन ।

यह सुनि दूत रोष बड़ कीन्हा । इन्द्रमतीसों बोले लीन्हा ॥
बार बार तोकहैं समुझावा । नाहि न समुझतमती हिरावा ॥
बोलत वचन निकट चलिआवा । इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलायी मुखपर मारा । रानी खसिपरि भूमि मँझारा ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती तब सुमिरन लायी । हे गुरु ज्ञानी होहु सहायी ॥
हम कहैं काल बहुत विधि ग्रासा । तुम साहिब काटो जमफाँसा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

सुनत पुकार मुहिं रहो न जायी । सुनहु धर्मनि यह मोर सुभायी ॥
रानी जबहीं कीन्ह पुकारा । तत छिन मैं तहाँहि पगुधारा ॥
देखत रानी भयी हुलासा । मनते भग्यो कालको त्रासा ॥
आवत हमरे काल पराया । भयी सुद्ध रानीकी काया ॥

इन्द्रमती वचन ।

तब कह इन्द्रमती कर जोरी । हे प्रभु सुनु विनती यक मोरी ॥
चीन्हि परी मोहि जमकी छाहीं । अब यहि देस रहब हम नाहीं ॥
हे साहब लै चलु निज देसा । इहवां है बहु काल कलेसा ॥
इहि विधि कही भयी उदासा । अबहीं लै चलु पुरुषके पास ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

तबहीं रानी लीनो संग। मेटयो काल कठिन परसंगा ॥
तबहीं ठीका पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाय। ॥
ले पहुँचायो मान सरोवर । जहवां कामिनि करहिं कलाहर ॥
अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पांव परायी ॥
जब कबीर सागर कहैं परसेउ । सुरति सागर तबहीं सरसेउ ॥
तेहि आगे सुरतिको सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥
लोक द्वार ठाढ तब कीन्ही । देखत रानी अति सुख भीनी ॥
हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥
सकल हंस कीन्हे सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥
भल तुम छोड़े कालके फन्दा । तुम्हरे कष्ट मिटेउ दुखदुन्दा ॥
आवहु हंस हमारे साथ। चलहु पुरुष कहैं नावहु माथा ॥
इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवे अब तोरे ॥

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