भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 239

सुन राजा व्याकुल ह्वै धावा । गुनी गारुडी वेगि बुलावा ॥
राय कहे सम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तच्छक गरल दूर होय जायी । देहुँ परगना तोहि दिवायी ॥

इन्द्रमती वचन ।

छंद—सब्द विरहुली जपेउ रानी, सुरति साहिब राखिहो ।
वैद गारुडि सब दूर भागो, दूर नरपति नाहि हो ॥
मंत्र मोहि लखाय सतगुरु गरल मोहि न लागई ।
होत सूर परकास जेहि छन, अंध अघोर नसावई ॥
सोरठा—ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ।
ठाढ भयी उठि नार, राजा लखि हरषित भयो ॥

यमदूत वचन ।

चला दूत तब उहँवा जायी । ब्रह्मा विस्नु महेश रहायी ॥
कहे दूत विष तेज न लागा । नाम परताप अन्ध हो भागा ॥

विष्णुवचन

कहे विस्नु सुनुं हो जम दूता । सेवहीं अंग करो तुम पूता ॥
छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
कीन्हो दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
देखत रानी छल मतिचीन्हा । आदर भाव न तनिको कीन्हा ॥

यमदूत वचन ।

तबहीं अस दूत वचन परगासा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीच्छा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदों काल करौं पिसमानी ॥
तच्छक काल होय तोहि खाये । तब हम राखलीन्ह तोहि आये ॥
छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बडाई ॥
अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभुके दरसन तोहि करावा ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती तब चीन्हेंउ रेषा । जस कछु साहिब कहेउ विसेषा ॥
तीनों रेख देख चख माहीं । जरद सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देसा । अब हम चीन्हेंउ तुम्हरो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनायी । हंस रूप सोभा किमि पायी ॥
तस हम तोरा रूप निहारा । है समरथ बड गुरु हमारा ॥