भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 238

करुणामय वचन ।

तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥
अब तुम्हार तिनका जम टूटा । परिचय भयो सकल भ्रमछूटा ॥
निसिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे जम धरम लबारा ॥
जवलगि ठेका पूरे आई । तब लग रहो नाम लौलाई ॥
छंद-सुमरहु नाम हमारसु निसिदिन, काल तो कहैं जब छले ।
आयु ठीका पुरे नाहिं जौलौं, तौलों जीव नाहीं चले ॥
काल कला परचंड देखु, गज रूप धर जग आवई ।
देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बहुरि न लावई ॥
सोरठा-गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।
रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥

इन्द्रमती वचन ।

हे साहिब मैं तुम कह जानी । वचन तुम्हार लीन्ह सिरमानी ॥
विनती एक करौं तुहि स्वामी । तुमतो साहिब अंतरयामी ॥
काल व्याल ह्वै मोहि सतायी । अरु पुनि हंस रूप भरमाई ॥
तब पुनि साहिब मो पहुँ आऊ । हंस हमार लोक लै जाऊ ॥

करुणामय वचन ।

कह ज्ञानी सुन रानी बाता । तुमसों एक कहों विख्याता ॥
काल कला धरि तो पहुँ आवे । नाना रंग चरित्र बनावे ॥
सब्द तोही हम दीन्ह लखाई । निसिदिन सुमरो चित लगायी ॥
तोरो ताहिकर मान गुमाना । कालके दावसो मिटै निदाना ॥
तेहि पीछे हम तुम लग अइहैं । मोहि देख तब काल परैहैं ॥
हंस तुम्हार लोक कहैं जाई । काल दगा रहन न पाई ॥

कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।

इतना कह हम गुप्त छिपाया । तच्छक रूप काल होआया ॥
चित्रसार पर तच्छक आया । रानी केर तहैं पलँग रहाया ॥
जबहीं रात बीत गइ आधी । रानी उठि चलीं सेवा साधी ॥
रानी सब कहैं सीस नवायी । चली तबैं महलन कहैं आयी ॥
सेज आय रानी पौढायी । डसेउ व्याल मस्तकमहैं आयी ॥

इन्द्रमती वचन ।

इन्द्रमती अस वचन सुनाई । तच्छक डसेउ मोहिकहैं आयी ॥