कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
हे धरमनि सो ताहि सुनावा । जस खेमसरी सो भाषेउ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पाछ कहीं अपने सहिदाना ॥
आनेउ सकल साज तब रानी । चौका बैठि शब्द धुनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुषध्यान सुमिरन सहिदाना ॥
उठि रानी तब माथ नवायी । ले आज्ञा परवाना पायी ॥
पुनि रानी राजहि समुझावा । हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा ॥
गहो सरन जो कारज चाहो । इतना वचन मोर निरबाहो ॥
राजा चन्द्रविजय वचन ।
तुम रानी अरधंगी सोई । हम तुम भगत होय नहिं दोई ॥
तेरि भगति कर देखों भाऊ । किहिविधि मोहि लेहु मुकताऊ ॥
देखों तोरि भगती परतापा । पहुँचो लोक मिटे संतापा ॥
कबीरवचन-धर्मदास प्रति ।
रानी बहुरि मोहिपहँ आयी । हम तिहिकालचरित्र लखायी ॥
रानी आई हमारे पास । तासो किया वचन परकासा ॥
सुनु रानी एक वचन हमारा । कालहु कला करे छल धारा ॥
काल ब्याल हँ तो पहुँ आयी । डसे तोहि सो देऊँ बतायी ॥
तो कहँ शिष्यकीन हमजानी । डसे काल तच्छक हँ आनी ॥
अब हमतो कहँ मन्त्र लखाओं । काल गाल सब दूर भागाओं ॥
लेहु शब्द विरहुली हम पाहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाही ॥
पनि अरू दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र में कहीं बखानी ॥
छल कर जम आवे तुव पास । सो तुहि भेद कहीं परगासा ॥
हंस वरण वह रूप बनायी । हम सब ज्ञान तोहि समझाई ॥
तुम सन कहे चीन्ह मुहि रानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल भेख सब देऊँ बतायी ॥
मस्तक छोटा काल कर जानू । आखिन गुंजन रंग बखानू ॥
काल लच्छ में तोहि बतायी । और अंग लब सेत रहायी ॥
इन्द्रमती वचन ।
रानी चरण गहे तब धायी । हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देश आहि जम केरा । लै चलुलोक मिटै झकझोरा ॥
यह तो देस कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देस अमानी ॥