कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिन्धु मथन त्रय सुत उत्पानी । सबही कहे पाछिल महिदानी ॥
जेहि विधिजीवन जमठगिराखी । सो सब ताहि सुनायउ भाखी ॥
मुक्त ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरन गहे अनुरागा ॥
इन्द्रमती वचन ।
जोरि पानि बोली बिलखाई । हे प्रभु जमलेहु छुडाई ॥
राज पाट सब तुमपर वारों । धनसम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु सरन मुहि दीनदयाला । बंदिछोर मुहि करहैं निहाला ॥
करुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुनु वचन हमारा । छोरों निश्चय बन्दि तुम्हारा ॥
चीन्हेंउ मोहि परतीत दिढाना । अबदे हूँ तोहि नाम परवाना ॥
कराइ आरति लेहु परवाना । भागे जम तब दूर षयाना ॥
चीन्हो मोहि करो परतीती । लहु पान चलु भौजल जीती ॥
आनहु जो कछु आरति साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावनयहि जग आवा ॥
धन सम्पति परमारथ लायी । करहु सन्त सन्मान बतायी ॥
सकल जीवहैं साहिब केरा । मोह विवस जिवपरे अंधेरा ॥
सब घट पुरुषअंश कियो बासा । कहीं प्रगट कहि गुप्तनिवासा ॥
छन्द— सब जीवहैं सतपुरुषके, बस मोह भरम विमानहो ।
जमराजको यह चरित सब भ्रम, जालजमपरधान हो ॥
जीवकाल बसहो लरत मोसे भ्रम वश मोहिन चीन्हही ।
तजि सुधा कीन्हो नेह विषसे, छोड़िघृत अँचवे मही ॥
सोरठा—कोई इकविरला जीव, परखि शब्द मोहिचीन्हई ॥
धाय मिले निज पीब, तजे जारको आसरो ॥
इन्द्रमती वचन ।
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुन खानी ॥
मोहि अधमको तुमसुख दीन्हा । तुव परसाद आगम ममचीन्हा ॥
हे प्रभु चिन्हतोहि अब पाहूँ । निश्चय सत्य पुरुष तुम आहूँ ॥
सत्य पुरुष जिन लोक सँवारा । करहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हिरदय अस हम जाना । तुमते अधिक और नहिं आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरति भाऊ । जो चहिय सो मोहि बताऊ ॥