कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरुणामय वचन ।
इन्द्रमती सुन कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुनपावन ॥
देस हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते ॥
तहाँ नहीं जम कर परवेसा । आदि पुरुषको जहवाँ देसा ॥
सत्य लोक तेहि देस सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत जोति पुरुष की काया । हंसन सोभा अधिक सुहाया ॥
आदि पुरुष सोभा अधिकारा । पटतर कहा देहुँ संसारा ॥
द्वीपकरी सोभा उजियारी । पटतर देहुँकाहि संसारी ॥
यहि तीनों पुर अस नहि कोई । जाकर पटतर दीजै सोई ॥
चन्द्र सूर यदि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥
सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिक ससि इकरोम लजाता ॥
एक रोमकी सोभा ऐसी । और बदनकी बरणौ कँसी ॥
ऐसे पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन सोभा कहों बिचारा ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अगर वासना हंस अधाना ॥
तब कबहुँ जामिनि नहि होई । सदा अँजोर पुरुष तन सोई ॥
कहा कहों कछु कहत न आवे । धन्य भाग जे हंस सिधाये ॥
ताहि देसते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥
सतयुग त्रेता द्वापर आये । तोसन वचन कहों सुखदाये ॥
जुगन जुगनमें मैं चलि आवों । जो चेत तेहि लोक पठावों ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु औरो जुग तुम आये । कौन नाम उन जुगन धराये ॥
करुणामय वचन ।
सतजुगमें मैं सतनाम कहायो । त्रेता नाम मुनीन्द्र धरायो ॥
अब करुणामय नाम धरावों । जो चीन्हे तिहि लोक पठावों ॥
कबीरवचन धर्मवास प्रति ।
धरमदास तेहि कहयो बुझायी । सतयुग त्रेता कथा सुनायी ॥
सोसुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बात सो पूछन लीन्हा ॥
उत्पति परलय और बहु भाऊ । जमचरित्र सब वरनि सुनाऊ ॥
जेहि विधि षोडश सुत प्रगटाने । सो सब भाष सुनाया ज्ञाने ॥
कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥
ग्रास अष्टंगी और निकासा । जेहि विधि भये मही आकासा ॥