भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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चरन धोय पुनि राखेसि रानी । ले चरनाम्रित जन्म सुभ जानी ॥

इन्द्रमतीवचन ।

पुनि प्रसादको अज्ञा मांगी । हेप्रभु मोकहैं करहु सुभागी ॥

जूठन परै मो गृह माही । सीत प्रसाद लै हमहैं खाहीं ॥

कुरुणामय वचन ।

सुनुरानी मुहि छुधा न होई । पंच तत्त्व पावे जेहि सोई ॥

अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥

देह हमारी तत्त्व गुन न्यारी । तत्त्वप्रकृतिहि काल रचिवारी ॥

असी पंच किहु काल समीरा । पंचतत्त्वकी देह खमीरा ॥

तामहैं आदि पवन इक आही । जीव सोहंगम बोलत ताही ॥

यह जिव अहै पुरुषको अंसा । रोकसि काल ताहि दे संसा ॥

नाना फंद रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहिं फांसै ॥

जिव तारन हम यहि जग आये । जो जिव चीन्ह ताहि मुकताये ॥

धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेक जीव कहैं दीन्हा ॥

नीर पवन कृत्रिम किय काला । विनसि जाय बहु करै बिहाला ॥

तन हमार यहि साजहिं न्यारा । मम तन नहिं सिरज्यो करतारा ॥

सब्द अमान देह है मोरा । परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति ।

सुनत वचन अचरज भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी ॥

रानी इन्द्रमती वचन ।

हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥

छन्द— इन्द्रमति आधीन होय कहै, कृपा करहु दयानिधी ।

एक एक बिलोय बरनहु, सब मोहिते सकलहु विधी ॥

विस्तु सम दूजा नाहिं कोई, रुद्र चतुरानन मुनी ।

पंचतत्त्व है खमीर तन तिहि, तत्त्वनके वश गुन गुनी ॥

सोरठा—तुम प्रभु अगम अपार, बरनो माने किन भये ।

मेटहु त्रिषा हमार, अपने परिचय मोहि कहु ॥

हे प्रभु अस अचरज मोहि होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥

कौन आहु कहवाँते आये । तन अर्चित प्रभु कहैवा पाये ॥

कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरनि कहो मोहि भेवा ॥

हम का जानहिं भेद तुम्हारा । ताते पूछा यह व्यवहारा ॥

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