कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचरन धोय पुनि राखेसि रानी । ले चरनाम्रित जन्म सुभ जानी ॥
इन्द्रमतीवचन ।
पुनि प्रसादको अज्ञा मांगी । हेप्रभु मोकहैं करहु सुभागी ॥
जूठन परै मो गृह माही । सीत प्रसाद लै हमहैं खाहीं ॥
कुरुणामय वचन ।
सुनुरानी मुहि छुधा न होई । पंच तत्त्व पावे जेहि सोई ॥
अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥
देह हमारी तत्त्व गुन न्यारी । तत्त्वप्रकृतिहि काल रचिवारी ॥
असी पंच किहु काल समीरा । पंचतत्त्वकी देह खमीरा ॥
तामहैं आदि पवन इक आही । जीव सोहंगम बोलत ताही ॥
यह जिव अहै पुरुषको अंसा । रोकसि काल ताहि दे संसा ॥
नाना फंद रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहिं फांसै ॥
जिव तारन हम यहि जग आये । जो जिव चीन्ह ताहि मुकताये ॥
धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेक जीव कहैं दीन्हा ॥
नीर पवन कृत्रिम किय काला । विनसि जाय बहु करै बिहाला ॥
तन हमार यहि साजहिं न्यारा । मम तन नहिं सिरज्यो करतारा ॥
सब्द अमान देह है मोरा । परखि गहहु भाष्यो कछु थोरा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
सुनत वचन अचरज भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी ॥
रानी इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
छन्द— इन्द्रमति आधीन होय कहै, कृपा करहु दयानिधी ।
एक एक बिलोय बरनहु, सब मोहिते सकलहु विधी ॥
विस्तु सम दूजा नाहिं कोई, रुद्र चतुरानन मुनी ।
पंचतत्त्व है खमीर तन तिहि, तत्त्वनके वश गुन गुनी ॥
सोरठा—तुम प्रभु अगम अपार, बरनो माने किन भये ।
मेटहु त्रिषा हमार, अपने परिचय मोहि कहु ॥
हे प्रभु अस अचरज मोहि होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई ॥
कौन आहु कहवाँते आये । तन अर्चित प्रभु कहैवा पाये ॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरनि कहो मोहि भेवा ॥
हम का जानहिं भेद तुम्हारा । ताते पूछा यह व्यवहारा ॥