कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
अस कह मृत्यु लोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा ॥
छोडया लोक लोककी काया । नरकी देह धरि तब आया ॥
मृत्यु लोकमें हम पगु धारा । जीवन सो सत शब्द पुकारा ॥
करुनामय तब नाम धराया । द्वापर जुग जब मंहिमें आया ॥
कोइ न बूझे हेला मेरी । बांधे काल विषय भ्रम बेरी ॥
रानी इन्द्रमती कथा ।
गढ गिरनार जबहिं चलि आये । चंद्रविजय नृप तहाँ रहाये ॥
तेहि नृप ग्रह रह नारि सयानी । पूजे साधु महात्म जानी ॥
चढी अटारी बाट निहारे । संत दरस कहैं काया गारे ॥
रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना ॥
मोहि पहुँ द्रिष्टि परी जब रानी । त्रिषली रसना कह यह बानी ॥
इन्द्रमती वचन ।
मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई ॥
दासी वचन ।
त्रिषली आय चरन लपटानी । नृप वनिता मुख भाष सयानी ॥
कही त्रिषली रानि अस भाषा । तुव दरशन कहैं बहु अभिलाषा ॥
देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरस मिटे सब साला ॥
करुणामय वचन—दासी प्रति ।
तब ज्ञानी कंहि वचन सुनावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
राज काज है मान बढाई । हम साधु नृप गृह नहिं जाई ॥
दासीवचन—रानी प्रति ।
चलि त्रिषली रानीपहुँ आयी । दुई कर जोरे विनय सुनाई ॥
साधु न आवे मोर बुलावें । राज राव घर हम नहिं जावें ॥
यह सुन इन्द्रमती उठि धाई । किन्ह दंडवत टेक्यो पाई ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे साहिब मोपर करु दया । मोरे गृह अब धरिये पाया ॥
कह रानी चलु मन्दिर मोरे । होब सुखी दरसन लिये तोरे ॥
कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।
प्रीति देख हम भवन सिधारें । राजा घर तबहीं पग धारे ॥
प्रीति देखि तेहि भवन सिधाये । दीन्ह सिंहासन चरन खटाये ॥