भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पुरुष वचन

ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । जमसों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीवन कहैं त्रासा । काटो जाय तिनहिंको फांसा ॥

ज्ञानी वचन ।

तब हम कहा पुरुषसों बानी । आज्ञा करहु सब्द परवानी ॥
कालहिं मेटि जीव लै आवो । बार बार का जगहिं सिधावो ॥

पुरुष वचन ।

कहा पुरुष सुन जोग सँतायन । सब्द चिताय जीव मुक्तायन ॥
जो अब कालहिं मेटो जाई । हो सुत तब मम वचन नसाई ॥
अबतो परे जीव यह फंदा । जगतिहिं आनहु परम अनंदा ॥
काल चरित परगट ह्वैं जाई । तब सब जीव चरन गह आई ॥
ज्ञान अज्ञान चीन्ह नहिं जायी । जाय प्रगट ह्वैं जिवन चितायी ॥
सहज भाव जग प्रगटहु जाई । जब लग जीव काल बस भाई ॥
देखहु भाव जीवनको भाई । काल चरित सब देहु बताई ॥
तोहि गहे सो जिव मुहि पैहैं । जिन परतीत नहीं जम खेहैं ॥
जाइ करहु जीवन कडिहारी । तोपर है परताप हमारी ॥
हमसों तुमसों अंतर नाही । जिमि तरंग जलमांहि समाहीं ॥
हम है तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट जम सब करिहैं थाना ॥
जाहु बेगि तुम वा संसारा । जीवन खेइ उतारहु पारा ॥

कबीरवचन—धर्मदास प्रति ।

चले हम तब माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जग मांहि सिधायी ॥
पुरुष अवाज चल्यो संसारा । चरण टेकु मम धरम लवारा ॥

निरंजन वचन ।

छंद—धरमराय तबहीं अधीन ह्वैं, विनती बहुत कीन्हैउ ।
किहि कारने अब जग सिधारेहु, मोहि सो मति दीन्हैउ ॥
अस करहु जनि सब जग चितावहु, इहै विनती मैं करौं ।
तुम बंधु जेठे छोट मैं, कर जोर तुम पायन परौं ॥

ज्ञानी वचन ।

सोरठा—कह्यो धरम सुन बात, विरल जीव मोहि चीन्हैहै ॥
सब्दनको पतियात, तुम अस कै जीवन ठगे ॥