भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 231

ज्ञानीजी पृथ्वीपर आये । इस समय करुणामय स्वामी गिरिनारमें प्रकट हुए । बहोंका राजा चन्द्रविजय था और उस राजाकी रानीका नाम इन्द्रमती था। वह रानी साधुसेवा तन मनसे करती थी । साधुकी सेवा तथा प्रेममें अपना धन तथा मन सब कुछ समर्पण करती थी । जब कभी साधुको देखती तो बड़े प्रेम और भक्तिके साथ उनकी सेवा किया करती और सब साधुओंका ज्ञान सुना करती थी । उस रानीकी सेवा, प्रेम और साधुभक्ति देखकर करुणामय स्वामी प्रसन्न हुए और जहाँपर रानी इन्द्रमतीका महल था उस पथसे होकर आप निकले ॥ रानी अपनी अटारीके ऊपर बैठी थी । उसने देखा कि, कोई साधु जाता है, तब उसे अपनी दासीको भेजा कि, तू जाकर उस साधुको बुलालेआ । जब वह दासी गयी और दंडवत् प्रणाम करके रानीका समाचार कहा, तब करुणामय ऋषिने उत्तर दिया कि, राजाओंमें अपने धन ऐश्वर्यका बड़ा अभिमान होता है, हम साधु हैं राजाओंके घर नहीं जाते । यह बात सुनकर वह दासी रानीके पास पलट आयी और कहा कि, वह साधु तो मेरे बुलानेसे नहीं आता है । यह बात सुनतेही स्वयम् रानी इन्द्रमती दौड़ती हुई आयी और सत्यगुरुको दंडवत् करके निवेदन करने लगी कि, हे महाराज ! आप मेरे गृहमें पधारकर मुझको सुभागी कीजिये । रानी इन्द्रमतीके प्रेम, निवेदन और नम्रताको देखकर करुणामय स्वामी उसके घर पधारे । रानीने चरण धोकर सत्यगुरुका चरणोदक लिया और बड़े आदर तथा सत्कारके साथ बैठाया । जब भोजनादि खिलाकर निश्चित होचुकी तब आपके पास ज्ञान सुननेके निमित्त आयी । जब सत्यगुरुकी बातें सुन चुकी तब कहने लगी, हे महाराज ! मुझको आप अपनी दीक्षा दीजिये । तब सत्यगुरुने रानीको अपना उपदेश दिया और वह आपकी चेली हुई । सत्यगुरुने उसको अपना ज्ञान भली भाँति समझा दिया । तब तो वह इन्द्रमती और भी भक्ति और प्रेमके साथ साधुसेवा करने लगी । उसने अपने पति राजा चन्द्रविजयसे कहा कि, हे महाराज ! आप भी सत्यगुरुकी दीक्षा ग्रहण कीजिये । तब राजाने कहा कि, हे रानी ! तू मेरी अधीक्षिनी है, तेरी भक्तिसे मेराभी उपकार होगा और मैं मुक्ति पाऊँगा । राजा चन्द्रविजयन सत्यगुरुकी दीक्षा नहीं ली । करुणामय स्वामी रानीको उपदेश देकर चले गये ।

यहाँपर अनुरागसागरका प्रमाण ।

त्रेता गत द्वापर जग आवा । तब पुनि भयो काल परभावा ॥
द्वापर जुग प्रवेस भा जबहीं । पुरुष अवाज कीन्ह पुनि तबहीं ॥