भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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यहिं जम देश बहुत दुख होई । जीव अम्बु बूझै नहिं कोई ॥
मोहि सब जीवन लै चलु स्वामी । कृपा करहु प्रभु अंतरजामी ॥

छन्द— यहिं देश है जम महा परबल, जीव सकल सतावई ।

कष्ट नाना भांति व्यापे, मरन जीवन लावई ॥

काम क्रोध कठोर त्रिस्ना, लोभ माया अति बली ।

देव मुनिगन सर्बाहिं व्यापे, कोट जीवन दलमली ॥

सोरठा—तिहुपुर जमको देस, जीवन कहैं सुख छनक नहिं ।

मेटहु काल कलैस, लेइ चलहु निज देशकहैं ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

बहुत अधीन ताहि हम जाना । कर चौका दीन्हा परवाना ॥

षोडश जिव परवाना पाये । तिनकहैंलैं सतलोक पठाये ॥

जमके दूत देख सब ठाडे । चितर्वाहिं जे जन ऊद्व अखाडे ॥

पहुँचे जाय पुरुष दरवारा । अंशन हंसन हरष अपारा ॥

परसे चरन पुरुषके हंसा । जनम मरनको मेटेउ संसा ॥

सकल हंस पूछी कुसलाई । कहु द्विज कुसल भये अब आई ॥

धरमदास यह अचरज बानी । गुप्त परगट चीन्ह सो ज्ञानी ॥

हंसन अमर चीर पहिराये । देह हिरम्मर लखि सुध पाये ॥

षोडश भान हंस उजियारा । अमृत भोजन करें अहारा ॥

अगर वासना त्रिप्त सरीरा । पुरुष दरस गदगद मितड धीरा ॥

यहिं विधि त्रेतायुगको भावा । हंस मुक्त ये नाम प्रभावा ॥

इति अनुरागसागरान्तर्गत त्रेतायुगकी कथा समाप्त ।

पंद्रहवाँ प्रकरण ।

द्रापर युगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रकट होना और

करुणामय स्वामीके नामसे प्रख्यात होकर

मनुष्योंको मुक्ति देनेका वृत्तान्त ।

रानी इन्द्रमतीकी कथा ।

जब त्रतायुग बीत गया और द्रापरयुगका समय आया तब सत्यपुरुषने कहा कि, हे ज्ञानी ! पृथ्वीपर जाकर सत्यपुरुषोंको उपदेश देकर मेरे लोकमें लेआओ । सत्यपुरुषकी जब आज्ञा हुई तब सत्यपुरुषको दंडवत् प्रणाम करके