कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहिं जम देश बहुत दुख होई । जीव अम्बु बूझै नहिं कोई ॥
मोहि सब जीवन लै चलु स्वामी । कृपा करहु प्रभु अंतरजामी ॥
छन्द— यहिं देश है जम महा परबल, जीव सकल सतावई ।
कष्ट नाना भांति व्यापे, मरन जीवन लावई ॥
काम क्रोध कठोर त्रिस्ना, लोभ माया अति बली ।
देव मुनिगन सर्बाहिं व्यापे, कोट जीवन दलमली ॥
सोरठा—तिहुपुर जमको देस, जीवन कहैं सुख छनक नहिं ।
मेटहु काल कलैस, लेइ चलहु निज देशकहैं ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
बहुत अधीन ताहि हम जाना । कर चौका दीन्हा परवाना ॥
षोडश जिव परवाना पाये । तिनकहैंलैं सतलोक पठाये ॥
जमके दूत देख सब ठाडे । चितर्वाहिं जे जन ऊद्व अखाडे ॥
पहुँचे जाय पुरुष दरवारा । अंशन हंसन हरष अपारा ॥
परसे चरन पुरुषके हंसा । जनम मरनको मेटेउ संसा ॥
सकल हंस पूछी कुसलाई । कहु द्विज कुसल भये अब आई ॥
धरमदास यह अचरज बानी । गुप्त परगट चीन्ह सो ज्ञानी ॥
हंसन अमर चीर पहिराये । देह हिरम्मर लखि सुध पाये ॥
षोडश भान हंस उजियारा । अमृत भोजन करें अहारा ॥
अगर वासना त्रिप्त सरीरा । पुरुष दरस गदगद मितड धीरा ॥
यहिं विधि त्रेतायुगको भावा । हंस मुक्त ये नाम प्रभावा ॥
इति अनुरागसागरान्तर्गत त्रेतायुगकी कथा समाप्त ।
पंद्रहवाँ प्रकरण ।
द्रापर युगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रकट होना और
करुणामय स्वामीके नामसे प्रख्यात होकर
मनुष्योंको मुक्ति देनेका वृत्तान्त ।
रानी इन्द्रमतीकी कथा ।
जब त्रतायुग बीत गया और द्रापरयुगका समय आया तब सत्यपुरुषने कहा कि, हे ज्ञानी ! पृथ्वीपर जाकर सत्यपुरुषोंको उपदेश देकर मेरे लोकमें लेआओ । सत्यपुरुषकी जब आज्ञा हुई तब सत्यपुरुषको दंडवत् प्रणाम करके