भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 229

कबीर वचन धर्मदास प्रति ।

रावनको कीन्हो अयमाना । अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना ॥

मधुकरकी कथा छंद—

तीन जीव परबोधि लंका, तब अवधनगरहिं आयऊ ।
विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरस तिन मम पायऊ ॥
मिलेउ मो कहैं चरण गहि, तब सीस नाय अधीनता ।
करि विनय बहु, लेगयो मंदिर, कीन्ह बहु बिधि दीनता ॥
सोरठा—रंक विप्र थिर ज्ञान, बहुत प्रेम मोसों किया ।
सब्द ज्ञान सहिदान, सुधा सरित बिहँसत वदन ॥
देख्यो ताहि बहुत लवलीना । तासों कह्यो ज्ञानको चीना ॥
पुरुष सँदेस कहेउ तिहिं पासा । सुनतबचन जिय भयउ हुलासा ॥
जिमि अंकुर तपै विन बारी । पूरन उदक जो मिले खरारी ॥
अम्बु मिलत अंकुर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥

मधुकर वचन ।

पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥

मुनीन्द्र वचन ।

चलहु तोहि लै लोक दिखाओं । लोक दिखाय बहुरि लै आवों ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति ।

राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥
सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकरको मन पतियाना ॥

मधुकर वचन ।

परचो चरण मधुकर अकुलाई । हे साहिब अब त्रिषा बुझाई ॥
अब मोहिं लेइ चलो ग माहीं । और न जीव उपदेश सो ताहीं ॥
और जीव गृहमाहिं जो आई । तिन कहैं हम उपदेसब जाई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

हंसहिं लै आये संसारा । पैठ देह जाग्यो द्विजबारा ॥
मधुकर घर षोडस जिव रहई । पुरुष संदेश सबनसों कहई ॥
गहहु चरण समरथके जाई । वही लेहिं जमसों मुकताई ॥
मधुकर वचन सबन मिलि माना । मुक्ति जान लीन्हों परवाना ॥

मधुकर वचन ।

कह मधुकर बिनतीसुन लीजै । लोक निवास सबन कहैं दीजै ॥