कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर वचन धर्मदास प्रति ।
रावनको कीन्हो अयमाना । अवधनगर पुनि कीन्ह पयाना ॥
मधुकरकी कथा छंद—
तीन जीव परबोधि लंका, तब अवधनगरहिं आयऊ ।
विप्र मधुकर मिलेउ मारग, दरस तिन मम पायऊ ॥
मिलेउ मो कहैं चरण गहि, तब सीस नाय अधीनता ।
करि विनय बहु, लेगयो मंदिर, कीन्ह बहु बिधि दीनता ॥
सोरठा—रंक विप्र थिर ज्ञान, बहुत प्रेम मोसों किया ।
सब्द ज्ञान सहिदान, सुधा सरित बिहँसत वदन ॥
देख्यो ताहि बहुत लवलीना । तासों कह्यो ज्ञानको चीना ॥
पुरुष सँदेस कहेउ तिहिं पासा । सुनतबचन जिय भयउ हुलासा ॥
जिमि अंकुर तपै विन बारी । पूरन उदक जो मिले खरारी ॥
अम्बु मिलत अंकुर सुख माना । तैसहिं मधुकर सब्दहिं जाना ॥
मधुकर वचन ।
पुरुष भाव सुन तेहि हरषंता । मोकहैं लोक दिखावहु संता ॥
मुनीन्द्र वचन ।
चलहु तोहि लै लोक दिखाओं । लोक दिखाय बहुरि लै आवों ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति ।
राख्यो देह हंस लै धाये । अमर लोक लैं तिहिं पहुँचाये ॥
सोभा लोक देख हरषाना । तब मधुकरको मन पतियाना ॥
मधुकर वचन ।
परचो चरण मधुकर अकुलाई । हे साहिब अब त्रिषा बुझाई ॥
अब मोहिं लेइ चलो ग माहीं । और न जीव उपदेश सो ताहीं ॥
और जीव गृहमाहिं जो आई । तिन कहैं हम उपदेसब जाई ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
हंसहिं लै आये संसारा । पैठ देह जाग्यो द्विजबारा ॥
मधुकर घर षोडस जिव रहई । पुरुष संदेश सबनसों कहई ॥
गहहु चरण समरथके जाई । वही लेहिं जमसों मुकताई ॥
मधुकर वचन सबन मिलि माना । मुक्ति जान लीन्हों परवाना ॥
मधुकर वचन ।
कह मधुकर बिनतीसुन लीजै । लोक निवास सबन कहैं दीजै ॥