कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंरावनका क्रोध प्रतिहार प्रति ।
सुनि नृप क्रोध कीन्ह तेहि बारा । तैं अतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
यह मति ज्ञान हरो किन तोरा । जो तैं मोहि बुलावन दोरा ॥
दरस मोर सिव सुत नहि पावत । मो कहै भिच्छुक कहा बुलावत ॥
हे प्रतिहार सुनहु मम वानी । सिद्ध रूप कहो मोहि बखानी ॥
वरन है कौन कौन तिहि भेषा । मो सन कहो दिष्टि जस देषा ॥
प्रतिहार बचन ।
अहो राजन तेहि स्वेत स्वरूपा । स्वेतहिं माला तिलक अनूपा ॥
ससि समान तिहि रूप विराजा । स्वेत वसन सब स्वेतहिं साजा ॥
मन्दोदरी बचन ।
कहे मंदोदरि रावन राजा । ऐसो रूप पुरुषको छाजा ॥
वेगहिं जाय गहो तुम पाई । तो तुव राज अटल होय जाई ॥
छोड़हुं राजा मान बडाई । चरन टेकि जो सीस नवाई ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
रावन सुनत क्रोध अति कीन्हा । जरत हुतासन मनु घृत दीन्हा ॥
रावन चला सस्त्र लै हाथा । तुरत जाय तिहिं काटों माथा ॥
मारा ताहि सीस खसि परयी । देखों भिच्छुक मुहि का करयी ॥
जहँ मुनींद्र तहँ रावन आया । सत्तर बार अस्त्र कर लाया ॥
लीन्ह मुनीन्द्र त्रिन कर ओटा । अति बल रावन मारै चोटा ॥
छन्द-- त्रिन ओट यहि कारने, है गर्व धारी राव हो ।
तेहि कारने यह जुगत कीन्ही, लाज रावन आय हो ॥
मन्दोदरी बचन ।
कहे मंदोदरि सुनहु राजा, गर्व छोड़ो लाज हो ।
पांव टेकहु पुरुषके गहि, अटल होवै राज हो ॥
रावण बचन ।
सो०--सेवा करें सिव जाय, जिन मोहि राज अटल दिये ।
ताकर टेकों पांय, पल दंडवत छन ताहिको ॥
मुनींद्र बचन ।
सुन अस बचन मुनींद्र पुकारी । तुम हो रावन गरब अहारी ॥
भेद हमारा तुम नहि जाना । बचन एक तोहि कहों निसाना ॥
रामचंद्र मारें तुहि आयी । मांस तुम्हार स्वान नहि खायी ॥