भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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मुनीन्द्रवचन संदोदरी प्रति ।

सुनहु वधू प्रिय रावन केरी । नाम प्रताप कटे जम बेरी ॥
ज्ञान दिष्टिओं परखहु आई । खराखोट तोहि देउँ चिन्हाई ॥
पुरुष अमान अजर मान सारा । सो तो तीन लोकते न्यारा ॥
तेहि साहिब कहैं सुमिरे कोई । आवागमन रहित सो होई ॥

विचित्र वधूवचन संदोरीको ।

चिवित्र वधू रानी समुझावा । गहो सरन जीवन मुकतावा ॥
विचित्र नारिगहिरानि सिखापन । लीन्हेंसि पान तजि भ्रम आपन ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

सुनतहिं सब्द तासु भ्रम भागा । गह्यो सब्द सुचि मन अनुरागा ॥
है साहब मोहि लीजे सरना । मेटहु मोर जन्म अरु मरना ॥
दीन्हों ताहि पान परवाना । पुरुष डोर सौप्यो सहिदाना ॥
गद गद भई पाय घर डोरी । मिलि रंकिहि जिमि द्रव्य करोरी ॥
रानी टेकेउ चरन हमारा । ता पाछे महलन पगु धारा ॥

मुनींद्रजीका रावणके पास जाना ।

तब मैं सवनपहैं चलि गयऊ । द्वारपालसों वचन सुनयऊ ॥

मुनींद्रवचन द्वारपाल प्रति ।

तासु कह एक बात समुझाई । राजा कहैं तुम आव लिवाई ॥

द्वारपाल वचन ।

तब पौरिया विनय यह लाया । महा प्रचंड है रावन राया ॥
सिव बल हिये संक नहि आने । काहूकेर वचन नहि भाने ॥
महा गरब अरु क्रोध अपारा । कहों जाय तो पलमें मारा ॥

मुनींद्रवचन द्वारपाल प्रति ।

सुनत वचन मुनीन्द्र तिहि बारा । द्वारपालहिं कहे परचारा ॥
मानहु वचन जाय यहि बारा । रोम बंक नहि होय तुम्हारा ॥
सत्य वचन तुम हमरो मानो । रावन जाइ तुरत तुम आनो ॥

प्रतिहार वचन ।

तेज देखि प्रतिहार सकाना । मुखते बोल न सका निदाना ॥
ततछन गा प्रतिहार जनायी । द्वै कर जोरे ठाढ़ रहायी ॥
सिद्ध एक जो हम पहैं आई । ते कह राजहिं लाव बुलाई ॥