भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 226

विस्नु सदा हमरे रखवारा । जमतें मोहि छुडावनहारा ॥
कोई महेसकी आस लगावे । कोई चंडी देवीहिं गावे ॥
कहा कहीं जिव भयो बिगाना । तजेउ खसमकहिं जारविकाना ॥
भरम कोठरी सब दइ डारा । फंदा दे सब जीवन मारा ॥
सत्व पुरुषकी आयसु पाऊँ । कालहिं भेटि छोर जिवलाऊँ ॥
जोर तो करों वचन नसायी । सहजहीं जीवन लेऊं चित्ताई ॥
जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अन चीन्हे जमके मुख जाही ॥

विचित्र भाटकी कथा लंकामें ।

चहुँदिश फिर आयेउँ गढ लंका । भाट विचित्र मिलो निःसंका ॥
तिनि पुनि पूछ मुक्ति संदेशा । तासो कहा ज्ञान उपदेशा ॥
सुना विचित्र तबहीं भ्रम भागा । अतिअधीन ह्वै चरनन लागा ॥
कहे सरन मुहि दीजै स्वामी । तुम सतपुरुष सदा सुखधामी ॥
कीजे मोहिं किरतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥
कहचो ताही आरतिको लेखा । खेमतरीहिं भाषेउ रेखा ॥
आनेउ भाव सहित सब साजा । आरति कीन्ह शब्द धुनि गाजा ॥
त्रिन तोरि बीरा तिही दीन्हा । ताके ग्रहम काहु न चीन्हा ॥
सुमिरन ध्यान ताहिंसों भाखा । पुरुष डोरि गेय नहिं राखा ॥
छन्द— विचित्र वनिता गयी नृप ढिग, जाय रानी सो कही ।
इक जोगी सुन्दर है महामुनि, तासु महिमा का कही ॥
स्वेत कला अपार उत्तम, और नहिं अस देखऊ ।
पति हमारे सरन गहि तिहि, जन्म सुभ करि लेखेऊ ॥

मंदोदरीकी कथा ।

सोरठा—सुनत मंदोदरी चाव, दरस लेन अकुलानेऊ ।
बिरली संग आव, कनक रतन लै पगुधरचो ॥
चरन टेकिके नायो सीसा । तब मुनींद्र पुनि दीन्ह असीसा ॥

मंदोदरी वचन ।

कहे मँदोदरी सुभादेन मोरी । विनती करों दोइ कर जोरी ॥
ऐसा तपसी कबहुँ न देखा । स्वेत अंग सब स्वेतहिं भेखा ॥
पम जिवकारज हो जिहिंभांती । सो मोहि कहो तजों कुल जाती ॥
हे समरथ मोहिं करहु सनाथा । भव बूडत गहि राखो हाथा ॥
अब अति प्रिय मोहिं तुम लागे । हो दयाल सकलो भ्रम भागे ॥