भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 225

सत्यपथपर लगाते और परमधामको पहुँचाते रहे । फिर कितनेही मनुष्योंको लेकर सत्यलोकमें पहुँचे ।

राजा जनक बड़े ज्ञानी थे फिर उनको मुनीन्द्रजीका पूरा उपदेश मिला । रामचन्द्रको कबीरसाहबने सब योगशक्ति सिखलाया और उनके समस्त संदेह मोचन किये देखो ग्रंथ अनुराग सागर और ज्ञान संबोध में, जैसे कबीर साहबने रामचन्द्रको सिखलाया तथा उनको पथ दिखलाया ।

रामचन्द्र वसिष्ठ हनुमान् इत्यादिको इस सत्यगुरुकी भली भाँति पहिचान नहीं हुई, इस कारण उनके आवागमनका दुःख दूर नहीं हुआ और मधुकर ब्राह्मण इत्यादिने उन्हें पहचानकर विश्वास पूर्वक पूर्ण भक्ति की इस कारण वे सत्य-गुरुके देशकों पहुँच गये ।

अनुराग सागरका प्रमाण ।

त्रेतायुग में मुनीन्द्रजी (कबीर साहब) के पृथ्वी पर आने की कथा सतजुग गयो त्रेता युग आवा । नाम मुनीन्द्र जीव समुझावा ॥
जब आयेउ जीवन उपदेशा । धरमराय चित्त भयउ अँदेशा ॥

धरमरायकी चिन्ता ।

इन भगवागर मोर उजारा । जिव लै जाहिं पुरुष दरबारा ॥
केतो छल बल करें उपार्ई । ज्ञानी डर मोरे नाहिं डराई ॥
पुरुष प्रताप ज्ञान तिहिं पासा । ताते मोरे न लागे फांसा ॥
इतते हम कछु पावैं नाहीं । नाम प्रताप हंस घर जाहीं ।
परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिंमन रहिया ॥
छन्द— सत्यनाम प्रताप धर्मनि, हंस धर निज कै चलै ॥
जिमि देख केहरि त्रास गज, हिय कंप कर धरनी रले ॥
पुरुष नाम प्रताप केहरि, काल गज सम जानिये ।
नाम गहि सत लोक पहुँचे, गिरा मम फुर मानिये ॥
सोरठा—सतगुरु सब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहे ।
रहे नाम लौ लाय, करम भरम मनमति तजे ॥
त्रेताजुग जबहीं पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्ह पैसारा ॥
जीव अनेकन पूछा जाई । जमसे को तुहि लेहैं छुड़ाई ॥
कहे भरम वश जीव अजाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥