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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उनके हाथको चूम लिया । तब कबीर साहब मुहम्मद साहबका उन स्थानोंके गुणका विवरण करके आगे चले ।

अठारहवाँ प्रकरण ।

चौथे मुकामका वर्णन ।

चौथा मुकाम लाहूत, जिबरूत और लाहूतके बीचमें ग्यारह पालङ्गका अन्तर है । एक पालङ्ग आठ करोड़ योजनका होता है । यह लाहूत स्थान अक्षर अंशका है । वहाँ अक्षर और योगमाया शक्ति रहते हैं । यह बड़ा सुन्दर स्थान है । जब कबीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुँचे, तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि, हे मुहम्मद ! देखो वह आपका स्थान है । यहाँही वह अक्षर पुरुष, जिसको आप बेचूनोचेराका खुदा कहते हैं, रहता है । फिर उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले ।

उन्नीसवाँ प्रकरण ।

पाँचवें हाहूत मुकामका वर्णन ।

पाँचवाँ स्थान हाहूत है यह हाहूत स्थान एक असंख्य योजन शून्यके ऊपर है । अर्थात् लाहूत और हाहूतके बीचमें एक असंख्य योजन शून्य अर्थात् खला और अंधकार है । यह हाहूत स्थान अचिन्त्य पुरुषका है । यहाँ अचिन्त्य पुरुष सप्तनीक रहते हैं । यह स्थान बड़ाही मनोहर है । अचिन्त्य पुरुषके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं । अचिन्त्य पुरुष निःशंक तथा निर्विघ्न रहते हैं । कबीर साहब इस स्थान और इस पुरुषका सब विवरण मुहम्मद साहबसे कहके आगेको चले ।

बीसवाँ प्रकरण ।

छठऐ बाहूतमुकामका वर्णन ।

यह बाहूत छठा स्थान है । बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजन शून्य और अंधेरा है अर्थात् हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजनकी ऊँचाईपर है यह अत्यंत मनोहर स्थान है । इस स्थानमें सोहंग पुरुष रहते हैं । सोहङ्ग पुरुषकी अर्धाङ्गिनीका नाम अर्धङ्ग है । यह सोहंग पुरुष अपनी शक्ति सहित अर्धगके साथ सिंहासनपर अधिकृत है । उस स्थानमें सदैव सोहंग ओहंगका शब्द सुनाई दिया करता है । जब कबीर साहब मुहम्मद मुस्तफाको लेकर इस स्थानपर पहुँचे तो, वहाँके समस्त वृत्तान्तोंका विवरण उन्होंने उनसे कहा और फिर आगे चले ।

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