कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसंत सुदरसनके पितु माता । लछमी नरहर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोडि तिन भाई । मनुषहि जनम धरे तिन आई ॥
श्वपच सुदर्शनके माता पिताका पहला जन्म ।
संत सुदरसनके परतापा । मानुष जनम विप्रके छापा ॥
दोनो जनम ठाम दोय लीना । पुनि विधि मिलै तिनहि कहैं दीना ॥
कुलपत नाम विप्र कर कहिया । नारि नाम महैसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि असनान सूरज व्रत धारी ॥
अंचल लै विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कहैं दौरी ॥
ततछन हम अंचलपर आवा । हम कहैं देखि नार हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेटो वोही । विप्र नारि ग्रह ले गइ मोही ॥
कहै नारि किरपा प्रभु कीना । सूर व्रत कर फल यह दीना ॥
बहुत दिवस लग तहौं रहाये । नारि पुरुष मिलि सेवा लाये ॥
रहे दरिद्र ते दुखी अपारा । हम मन महैं अस कीन विचारा ॥
प्रथमहिं दरिद्रता इन कर हारों । पुनि भगति मुक्ति कर बचन उचारों ॥
जब हम पलना झटक झकोरे । मिलत सुवरन ताहि इक तोरे ॥
नित प्रति सोन मिले इक तोला । तातै भये वह सुखी अमोला ॥
पुनि हम सत सब्द गोहरावा । बहुत प्रकारते उर्नहि समझावा ॥
तिन हिरदय नहिं सब्द समाया । बालक जानि परतीत न आया ॥
ताही देह चीन्हसि नहिं मोही । भयो गुप्त तहैं तन तजि ओही ॥
श्वपच सुदर्शनके माता पिताका दूसरा जन्म
नारि द्विज दोउ तन त्यागा । दरस परभाव मनुज तन जागा ॥
पुनि दोनो भये अंस मिलाऊ । रहहिं नगर चंदवारे नाऊ ॥
ऊदा नाम नारि कहैं भयऊ । पुरुष नाम चन्दन धरि गयऊ ॥
पुरुषोत्तम ते हम चलि आये । तब चंदवारा जाइ परगटाये ॥
बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा । कीनेउ ताल मांहि बिसरामा ॥
कमल पत्र पर आसन लाये । आठ पहर हम तहौं रहाये ॥
पाछे ऊदा असनामहिं आयी । सुन्दर बालक देखि लुभायी ॥
दरस दियो तिहिं सिसु तन धारी । ले गयि बालक निज घर नारी ॥
ले बालक गिरह अपने आयी । चंदन साहु अस कहा सुनायी ॥
कहु प्यारी बालक कहैं पायी । कौनी विधि ते इहवों लायी ॥
कह ऊदा जल माहीं पावा । सुन्दर देखि मोरे मन भावा ॥