कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकह चंदन तै मूरख नारी । बेगि जाहु दै बालक डारी ॥
जाति कुटुम हरिहैं सब लोगा । हंसत लोगं उठि है तन सोगा ॥
ऊदा तरस पुरुष कर माना । चन्दन साहु जबै रिसियाना ॥
बालक चेरिहि दीन उठायी । ले बालक जल देहु खसायी ॥
चल चेरी बालक कहैं लीना । जल महुँ डारन ताहि चित दीना ॥
चलि भइ मोहि पंवैरन जबहीं । अन्तरधान भये हम तवही ॥
भयो गुपुत तेहि करसे भाई । रुदन करै दोनो विलखाई ॥
विकल होय बन ढूँढत डोले । मुगध ज्ञान कछु मुख नहिं बोले ॥
यहिविधि बहुत दिवस चलिगयऊ । तजि तन जनम बहुरि तिन पयऊ ॥
श्वपचसुदर्शनके माता पिताका तीसरा जन्म
मानुष तन जुलहा कुल दीना । होउ संजोग बहुरि विधि कीना ॥
कासी नगर रहे पुनि सोई । नीरू नाम जुलाहा होई ॥
नीमा नाम नारि कर भाई । नारि पुरुष हो मिल पुनि आई ॥
इति श्वपचसुदर्शनके मातापिताके तीन जन्मकी वार्ता
छत्तीसवाँ प्रकरण ।
नीमा और नीरूका बालक पाना
इसका विवरण इस प्रकार है कि, नीरू जोलाहा काशी नगरीमें रहता था । एक दिवस वह अपना मुकलावा (गवना) लेनेको गया और अपनी स्त्री सहित चला आता था । देवात् वह लहर तालाबके समीपसे होकर निकला । उसकी स्त्री नेमा प्यासी हुई और जल पीनेके निमित्त उस तालाबपर गयी । जब जल पी चुकी तब दृष्टि उठाकर उस तालाबको देखने लगी । देखा तो एक बड़ाही सुंदर बालक कमलके फूलोंपर हाथ पौंव फेंक रहा है । उस बालकको देखकर वह जोलाही तालाबके भीतर घुस गयी, और उस बच्चेको अपनी गोदमें उठा लिया । तालाबसे बाहर निकलकर नीरूके पास गयी । प्रमाण आदि मंगल—
दोहा—“नीरू नाम जुलाहा, गमन लिये घर जाय ।
तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥
तब जोलाहेने पूछा, कि, यह किसका लड़का ले आयी है ? तब नीमाने उत्तर दिया कि, मैंने तालाबमें पाया है नीरूने कहा, यह लड़का जहांसे तू ले आयी है वहांही रख आ । नहीं मालूम यह किसका लड़का है ? तब उस स्त्रीने उत्तर दिया कि, ऐसा सुन्दर बालक तो मैं कदापि नहीं फेकूंगी । नीरूने कहा कि, लोग