कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमुझको हँसेगे और ठठुएँ उड़ावेंगे कि, गौनेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेआया है इस कारण तू इस बालकको फँकआ ।
“नीरू देख रिसावई, बालक दे तू डार ।
सब कुटुम्ब हँसी करे, हसि मारे परिवार ॥
इस बातको जब नीमाने नहीं माना; तब वह जोलाहा अपनी स्त्रीको मारने पीटने पर तत्पर हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । तब नीमा खड़ी २ अपने चित्तमें चिन्ता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, हे नीमा ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्मके प्रेमके कारण तुम्हारे घर आया हूँ । तुम मुझको मत फँको और अपने घर ले चलो । यदि तुम मुझको अपना गुरु करके मेरा कहना मानोगे तो मैं तुम्हे आवागमनके झंझटसे छुड़ाकर मुक्त कर दूंगा और तुम्हारा समस्त दुःख संताप हर लूंगा । तुमको वह शब्द बतलाऊँगा कि, जिससे तुम कभी कालके फन्देमें नहीं पड़ोगे ।
“तब साहब हुँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति सन्देश सुनाइहौं, मैं आया यहि काम ॥
पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसारी मौहि ।
पिछली प्रीतिके कारने, दरसन दीनो तोहि ॥”
जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी और अपने पतिसे नहीं डरी । तब नीरूभी फिर कुछ नहीं बोला ।
“कर गहि बेगि उठाइया, लीन्हो कंठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, रंक महा धन पाय ॥
वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर गये ।
सैतीसवाँ प्रकरण ।
बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना ।
काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेता आया है, तो लोग ठठटा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है और बालकका कुल विवरण कह सुनाया ।
फिर नीरू ब्राह्मणको बुलाकर पूछने लगा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? ब्राह्मण तो पत्रा लिये विचारही रहा था इतनेमें बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है । दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता