कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकारण परमेश्वर विष्णुसे सदैव प्रेम रखना चाहिए। ऋग्वेद १-२-७-४
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।
दिवीव चक्षुराततम् । । ऋग्वेद १- २-७-५ ।
अनुवाद—ऐ ज्ञाताओ और मुक्ति योग्य मनुष्यों ! विष्णुका जो श्रेष्ठ और ऊँची श्रेणीवाला सत्यलोक हैं जो सबके जानने योग्य हैं, जिसको पाकर परमानन्दको प्राप्त हो जाता है फिर वहाँसे कभी दुःखमें नहीं पड़ता । इस श्रेणीको बहादुर और धर्मात्मा और वासनाओंको दमन करनेवाले सबके भिन्न बुद्धिमान पुरुष बड़े सोचसे देखते हैं । जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त स्थानोंमें हैं । ऐसेही परब्रह्म विष्णु समस्त स्थानोंपर उपस्थित है । परम स्वरूप परमात्मा है । उसीके संयोगसे जीव समस्त दुःखोंसे छूटता है । बिना उसके जीवको कभी सुख नहीं मिलता, इस कारण प्रत्येक रूपसे परमेश्वरसे मिलनेका उद्योग करना चाहिए ।
१-२-७-५ ।
त्वं द्वि विश्वतोमुखो विश्वतः परिभूरसि ॥
अप नः शोशुचदधम् ॥ ऋग्वेद १-७-५-६ ॥
अनुवाद—हे अग्नि परमात्मा ! आप समस्त विद्याओंमें एवं समस्त स्थानों पर उपस्थित हो । आपके अनन्त मुंह हैं । वही शक्ति जिसके बलसे समस्त जीवोंके सद्पददेश सदैव हो रहा हो वही आपका मुख है । ए दयालु ! आपकी दयासे हमारे समस्त पातक पृथक् हो जायें जिसमें हमलोग निष्पाप होकर सदैव आपकी, भक्तिप्रार्थनामें संलग्न रहें । ऋग्वेद-१-७-५-६ । ऋग्वेद ऋग्वेद-
इसी विष्णुकी प्रशंसा चारों वेद करते हैं । इसी विष्णुको चारों वेद छ शास्त्र और अठारह पुराणोंने परमेश्वर कहा है । समस्त श्रुति स्मृति इसीसे-अपनी मुक्तिकी आशा रखते हैं । समस्त ऋषि मुनि औलिया अम्बिया इसी विष्णुकी बड़ाई तथा प्रभुता प्रगट किया करते हैं । समस्त वेद तथा पुस्तकोंमें इसी विष्णुकी पूजा कही है । इस परमेश्वरके अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर इस लोकमें नहीं है ।
देवीभागवतके नवम स्कन्धके पन्द्रहवें अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुने कपट से वृन्दाके आसुरीत्वका अपहरण किया । तब उसने शाप दिया कि, तू पाषाण हो जा । देखो नवम स्कंधके चौबीसवें अध्यायमें विष्णु शालिग्राम पाषाण हो गये । और वृन्दा (तुलसी) गण्डकी नदी हुई और इस गण्डकीमें शालिग्राम रहने लगे और तुलसी उनके शीशपर चढ़ती है यही कबीर साहिबने कहा है कि—