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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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साखी—वृन्दाकरे शापसे, शालिग्राम औतार ।

कहे कबीर सुन पण्डिता, कह पूज होवे उधार ॥

जो वृन्दाके शापसे शालिग्रामके रूपमें अवतृत हुआ, कबीर साहिब कहते हैं कि पंडितों ! उसके पूजन से उद्धार हो जायगा ।

इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता ।

मूसाकी प्रथम पुस्तक पैदायशका तीसरा बाब २२ आपत देखो जब आदम उत्पन्न हुआ उसने आज्ञा नहीं मानी तब आदमको बैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया । बैकुण्ठकी वाटिकामें चमचमाती हुई आखोंवाले दूतोंका पहरा बैठा दिया कि आदम आयुवा फल खाने न पावे । खुदाबन्दने कहा कि, मनुष्य भलाई बुराइकी पहचानमें हममेंसे एकके सद्गुण हो गया । अब ऐसा न हो कि, हाथ बढ़ावे अमर फलमेंसे कुछ खावे, सदैव जीवित रहे ।

इस परमेश्वरके सद्गुण अनेक परमेश्वर हैं क्योंकि, यहाँ बहुवचन शब्द रक्खा गया है । जैसा कि पूर्वमें लिख आया है कि महा मायाके बलसे करोड़ों और अनगिनती ब्रह्मा रुद्र इन्द्र इत्यादि बुलबुलेके समान उत्पन्न होते और फिर उसीमें समाजाते हैं । सो उसकी लीला एक अगाधसागर है । ये सभी मायासे उत्पन्न हुए स्वयम् माया हैं । यह खुदाको दर्शन देता था और समस्त कार्योंसे उसको विज्ञ किया करता था ।

जैसे आदमके साथ उसी प्रकार नूहके साथ श्री यह खुदा रहता था । जब बाढ़ समाप्त हो चुकी नूह अपनी नासे बाहरआया । एवम् समस्त जीवों सहित पृथ्वीपर चरण धरा (देखो मूसाकी पहली पुस्तक) उत्पत्ति का ८ वाँ बाब २० आयत) तब नूहने खुदाबन्दके निमित्त बलिप्रदानस्थल बना समस्त पाक पक्षियों तथा समस्त पाक पशुओंमेंसे लेकर उस बलिप्रदानस्थलीपर जलाकर बलिप्रदान किया । उस समय खुदाबन्द उस सुगंधिके सृष्टनेके निमित्त आकाशसे उतरा । खुदाबन्दने अपने मनमें कहा कि, मनुष्यके निमित्त मैं अब पृथ्वीको कदापि लानत नहीं करूँगा । इस कारण कि, मनुष्यके चित्तकी वृत्ति बचपनसेही बुरी है जैसा कि, मैंने किया है, फिर कभी समस्त जीवोंको नहीं मारूँगा । बरन् जबलें पृथ्वी हैं तबलें बोना और लोना, शरदी गर्मी अगहनी और वैशाखी, दिन और रात बंद न होंगे ।

नवों बाब पहली आयत । खुदाबन्द ने नूह और उसके पुत्रोंको बर्कतदी और उन्हें कहा कि, फलो बढ़ो, पृथ्वीको भरपूर करो । खुदाबन्दने प्रण किया कि, मैं भविष्यतमें किसी जीवको बाढ़से कभी न मारूँगा, मनुष्यके अतिरिक्त समस्त