कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 367 of 1367
Read in contextनाम तौरैत पुस्तक ठहरा । वह तौरैत पहली पुस्तक है जो पश्चिमी पैगम्बरों (अनागत वक्ताओं) को मिली अनेक बेर खुदाबन्द ने मूसा से बातें की और मित्र की भाँति सब कुछ सिखलाया मूसाने खुदाबन्दको स्वच्छभुसे देखा, देखो मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोज चौबीस बाब ९ आयत ।
तब मूसा, हारूँ, नहब अबीद तथा सत्तर इसराईली श्रेष्ठ पुरुष ऊपर गये (१०) और उन्होंने इसराईलके परमेश्वरको देखा । उसके पैरोंके नीचे नीलमके पत्थरकी गचकारी थी, उसका स्वेच्छ शरीर आकाशके सदृश था । (१०) बनी इसराईलके अमीरोंपर उसने अपना हाथ न रक्खा उन्होंने खुदाको देखा और खाया पीया ।
यह आसमानी रङ्गका परमेश्वर समस्त संसारपर शासन करता है । उसका भेद कोई नहीं जानता । हों कोई कोई संत उस खुदाके भेदको जानते हैं वे मायाके दगासे बच जाते हैं । नहीं तो सांसारिक मनुष्योंकी क्या सामर्थ्य है जो कि, बच सकें । केवल सत्यगुरुकी दया जिसपर हो वह बच सके एवं वही पहचान सकता है ।
इस खुदाकी ठीक तसबीर सूरत शकल सवारी इत्यादी खरकैल नबीकी पुस्तकमें देखो ।
प्राचीन नियमपत्र बखरकैल नबीकी पुस्तकका सार ।
तीसवें वर्षके चौथे महीनेकी पाँचवी तारीख को ऐसा हुआ कि, जब मैं नहर कबीरके किनारे आस्तीरोंके बीचमें था तो आकाश खुल गया मैंने खुदाबन्दका तेज देखा (२) उस महीनेके पाँचवे दिवस यानी यहपकीन बादशाहके बंदी होनेके पाँचवें वर्षमें (३) ऐसा हुआ कि, खुदाबन्दका वचन बोजीकाहनके पुत्र खरकैलको, कसदियों के देश में नहर कबीरा के किनारे पर था पहुँचा । वहाँ खुदाबन्दका हाथ उसपर था (४) मैंने दृष्टिपात किया तो क्या देखता हूँ कि, उत्तरसे एक बगूला उठा एक बड़ी घटा एक आग जिसकी लवें आपसमें लपटी जाती थीं, जिसके गिर्द प्रकाश चमकता था और उसके मध्यमें यानी उस आगमेंसे पालिश की हुई पीतलकीसी मूर्ति दिखलाई दी । (५) उसके मध्य चार जीवोंकी एक प्रतिमा दिखलाई दी । उनकी सूरत यह थी कि, वो मनुष्यसे मिलती जुलती थीं । (६) प्रत्येकके चार २ पंख थे । उनके पैर जो थे वो सीधे थे । उनके पावोंके तलुवे बछरूके पावोंके तलवेसे थे । मंजे हुए पीतलके सदृश झलकते थे । (८) उनके चारों ओर पंखोंके नीचे मनुष्यके हाथ थे । मुंह तथा पंखभी इन चारोंके थे । (९) उनके पंख आपसमें एक दूसरेसे मिले