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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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थे, और वे चलते हुए मुड़ते नहीं थे, वरन् वे सब बराबर सीधे आगेको चले जाते जाते थे। (१०) यही उनके चेहरेकी मिलान तथा समानता, सो उन चारोंमें एक का चेहरा मनुष्यका, एकका चेहरा शेरका उनकी दाहिनी ओर एकका चेहरा बैल तथा एकका चेहरा उकाबका था। (११) उनके चेहरे यों हैं। उनके पंख ऊपरसे फैलाये हुये थे। प्रत्येकके दो पंख दूसरेके दो पंखोंसे जुटे हुए थे। दोनोंसे उनका शरीर ढका हुआ था। (१२) उनमें से प्रत्येक आगेको सीधा चला जाता था। जिधर आत्मा जाती थी वे जाते थे। वे चलते हुये फिरते न थे। (१३) रही उन जीवोंकी सूरत, सो उनकी सूरत आगके सुलगे हुये कोयलों और जलते हुये प्रदीपके सदृश थी। वह उन जीवोंके बीच इधर उधर आती जाती थी। वह अग्नि तेजमय थी। तथा उस अग्निमें से बिजली वर्हिगंत होती थी। (१४) वे जीव दौड़ जाते थे और पलट आते थे। जैसे बिजली चमक जाती है।

(१५) सो जब मैं उन जीवोंको देख रहा तो क्या देखता हूँ कि, उन जीवोंके पास एक पहिया चार मुंह वाला पृथ्वीपर है। (१६) रही इन पहियोंकी सूरत और उनकी बनावट, जो वह पत्रेकीसी दिखाई देती थी, उन चारोंका डौल एकही था। उनकी सूरत तथा बनावट ऐसी थी मानों पहिया पहिएके बीचमें था। (१७) जब वे चलते थे तो वे चारों ओर ढलते थे ढलते हुए पीछे न फिरते थे। (१८) उनका घेरा जो था सो ऐसा ऊँचा था कि, भय जान पड़ता था। इन चारोंके घेरेमें चारों ओर आँखें फिरी हुई थीं। (१९) जब वे जीव चलते थे तो पहिये उनके साथ चलते थे। जब वे जीव पृथ्वीसे उठाए जाते थे तो पहिए भी उन्हीके साथ उठाए जाते थे क्योंकि, पहिएमें जीवोंकी आत्माएँ थीं। (२२) उस प्रकाशकी सूरत जो उन जीवोंके मस्तकोंपर थी ऐसी थी जैसे डरावने बिलौर का प्रकाश होता है। वह उनके मस्तकों पर फैला हुआ था। (२३) उससे नीचे उनके समपर थे। एक दूसरेकी ओर था। प्रत्येकके दो दो थे। जिनसे उनके शरीरोंका एक रुख और दू दू पहने उनसे दूसरा रुख ढका रहता था। (२४) मैंने उनके परोका शब्द सुना मानों बहुत पानियोंका शब्द आवज्जद क्रादिर मुतलक्का शब्द है। जब वे चलते थे, ऐसे शोरकी आवाज हुई जैसे लश्करकी आवाज है। जब ठहरते थे अपने परोको लटका देते थे। इस फ़िजामेंसे जो उनके मस्तकों के ऊपर थी एक प्रकारका शब्द होता था। (२५) उस फ़िजासे ऊँचे पर जो उनके शिरोंके ऊपर था सिंहासनकी सूरत सूरत थी, उसका दिखावा नीलमके पत्थरकासा था, उस सिंहासनके समान