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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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तुम्हरी चाल पाहनहुते भारी ।

वाटिकि देह पवनको शरीरा, हरिठग ठगतसो उरल कवीरा ॥

कबीर दासजी उन गुरुओंके लिये कहते हैं जो भगवान् के तत्त्वको न जान उनकी निन्दा स्तुतिसे अपना कार्य चलाते हैं कि, भगवान् विष्णुके नामपर नकली गुरु बिना विष्णुके सत्यरूपको जनाये ज्ञानी होनेके ठगरी करते फिरते हैं । जब यमराज आकर घेर लेता है तो भी वे वह नहीं कहते कि, हमने सत्यपुरुष विष्णुके नामपर तुमें धोखा दिया था ।

हम तुम बालापन के मित्र हैं । हमें छोड़कर पहिले ही कहाँ चल दिये । आप बिना मंत्र सिद्ध कियेही लोगोंको चेला करने चल दिये जैसे गुरु वैसेही चेला हैं आजकलके गुरु लोगोंकी चाल पत्थरसेभी ज्यादा जड़ है क्योंकि, पत्थर तो जड़ होनेके कारण सत्यपुरुष विष्णुभगवान्का चिन्तन नहीं कर सकता किन्तु ये गुरु लोग चैतन्य होकर भी विष्णुको भी नहीं पहिचानते । पृथ्वी आदिका स्थलदेह तथा प्राणादि वायु आदिका सूक्ष्म है । कबीर साहेब कहते हैं कि, ऐसे पाखण्डियोंसे डरकर जीव भगवान् विष्णुके चरणोंमें पुकार मचावे हैं कि, मेरी रक्षा हो ।

शब्द ३८—हरि विनु मर्म बिगुर विन गन्दा ।

जहूँ जहूँ गयो अपन पाँ खोये, तेहि फन्दे बहु फन्दा ॥ १ ॥

योगी कहे योग है नीको, द्वितिया और न भाई ।

चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि, तिनहुँ कहाँ सिधि पाई ॥ २ ॥

ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता, ये जो कहहिं बड हमहीं ।

जहूँ ते उपजे तहूँहि समाने, छूटि गये सब तबहीं ॥ ३ ॥

बाँये दहिने तजो विकारै, निजुकै हरिपद गहिया ।

कह कबीर गूगे गुर खाया पूछेसो का कहिया ॥ ४ ॥

गन्दा—मलिन बुद्धिवाला, विन—पक्षीजीव—हरि—विष्णुभगवान्के, बिहु—बिना, बिगुर—बिगड़ गया । अपनेपे-अपने आत्मतत्वको, खोये-खोकर, जहूँ जहूँ—जिस जिस जगह गयो—पहुँचा, बहूँही, तेहि—उसे, बहुत—बहुतसे, फन्दा—झगड़े पड़े । अथवा जहाँ जहाँ गया अपने भजन ध्यान ही खोये और बिना विष्णुकी कृपाके संसारी बन्धनोंमेंही बँधा । योगी कहते हैं कि, योगही अच्छा है । योगके मुकाबिलेमें दूसरा कुछ नहीं है । उन्होंने तप किये शिर मुड़ाये मौन रहे जटाएँ राखीं पर क्या सिद्धि प्राप्त की, येही क्यों, ज्ञानी शूर कवि और दाता ये भी कहते हैं कि, हमही बड़े हैं जिस गर्भसे उपजे थे फिर उसी गर्भमें जन्म लेने चले गये । उनके सब मत रखेही रह गये । वाम और दक्षिण दोनों विकारोंको छोड़ दो, भगवान् विष्णुकी शरणको अपनी मानकर ग्रहण करो । जिससे कल्याण हो