कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमनमें विचार और चिन्ता नहीं है कि, उसपर विचार करके यथार्थ अवस्था से विज्ञ हो । न उनके मनमें दूढ़नेकी अभिलाषाही है ॥
विष्णुके उपकार ।
कितने मनुष्य ऐसा कहते हैं कि, हम तो विष्णुको परमेश्वर कदापि न मानेंगे और न उसकी कृतज्ञता स्वीकार करेंगे । भला विचारना चाहिए कि, यदि चूहा कहे कि, मैं शेर बबरसे सामना करूँगा उसकी कृतज्ञता न करूँगा । भला यह संभव है कि, चूहा शेर बबरसे विरुद्धता कर सके । ऐसेही ये मूर्ख मनुष्योंके ध्यान हैं कि, हम विष्णुकी आज्ञासे बाहर चरण रक्खेंगे । यह बात सर्वतोभावसे असंभव है कि, कोई मनुष्य मायाकी सेवासँ बाहर जासके । हों वह मनुष्य जो साधुगुरुकी सेवामें तन मन धन अर्पण करेगा वह विष्णुके वात्सल्यभावसे बंधनसे निकलेगा । जितने तनुपोषक और सांसारिक कांक्षासे भरे हैं कोई किसी धर्मका क्यों न हो सदैव विष्णुका सेवक रहेगा । क्योंकि, जितने धर्म पृथ्वीपर हैं वे सब बन्धनके कारण हैं कबीर साहबके शरण बिना अन्तमें समस्त जीवोंको विष्णुकी मायाके ग्रहमें प्रविष्ट कराते हैं । इस ब्रह्माण्डको चीरकर पार जानेकी किसीमें सामर्थ्य तथा बल नहीं जो कोई कुछ पावेगा सो सत्तगुरुकी सहायतासे पावेगा । दूसरी कोई युक्ति नहीं । सबके सब वेद और पुस्तकोंके बंधनमें पड़े हैं । केवल गुरुमुख पार उतरेंगे, मनमुख सब डूब मरेंगे । गुरुमुखके निमित्त भक्ति मुक्ति प्रस्तुत हैं । मनमुखके निमित्त सदैव का बंधन प्रस्तुत है । इस बातको समस्त संत महंत सदैवसे पुकारते चले आते हैं । गुरुमुखके निमित्त दोनों संसारमें विभ्राम है । समस्त ऋषि सिद्धि गुरुमुखके चरे हैं ।
मुखम्मस तरजीयबन्द ।
सरापा जीव करमोंसे लदा है । तमन्ना दीनवीमें पुर सदा है ॥
बहरदो एकसो शाहो गदा है । कहाँ दर ख्वाव विहमुक्ती पदा है ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
है जैसी रूह वैसे ही फ़रिश्ते । बंधे सब जीव हैं आमालरिश्ते ॥
कुदूरत और आलायश आगश्तः । न कर होश इब्र आदम कालकुशतः ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
यह कहने ही को हैं सब आदमेजाद । कियाशहवातने अकल उनकी बरबाद ॥
तअस्सुबमें हुए हैवान दिलशाद । यही सब जीवके बंधनकी बुनियाद ॥
यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।
न सद्गुरु बिन वसह तदबीर छूटे । न अमाला कारिश्नः उसके टूटे ॥
जपो तपज्ञान ध्यान उसका सो लूटे । जिघर जावैं उधर धर कालकूटे ॥