कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextयह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
फिकरमें सब लगे खुद खावसुखरकी । न खिदमत और नपरस्तिशसाधुगुरुकी ॥
खबर क्योकर मिले उस धामधुरकी । फँसे सब फंदमें ठगजीव बुरकी ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
न तन मन धनसे हो जबसे निरासा । रहेगा तबतलक यह काल फाँसा ॥
करो जप तप महलमें होवे वासा । हवस जब तर्क हो मुक्ति हो पासा ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
हवस है दीनवी दिलमें यह जवतक । न पावै रस्तगारी जीव तब तक ॥
सभी आमाल इसके जाल अवतक । न हरगिज पहुँचे घरलासा नीरव तक ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
तअस्सुब छोड़कर कर अकलओ होश । यगानः मिल बेगानः कर फ़रामोश ॥
नसाएह पन्द सुन अज्ज सन्त करगोश । मदद गुरु साधु चल तु पार नौ कोश ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
जिधर जावे उमर जीवका मरण है । हरण दुःखद्वंद्व सतगुरुकी शरण है ॥
वही मुकता वही तारनतरन है । वह आजिज जीवकापोशन बेहतरन है ॥
यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।
इसका भाव वही है जिसका कि, निरूपण कर चुके हैं । उसीके सारको लेकर इस कवितामें कहा है कि दोनोंका एकही रूप है सत्य पुरुषसे भिन्न नहीं ।
अध्याय ८.
ब्रह्माजीकी कथा ।
यह ब्रह्मा समस्त संसारका रचयिता कहलाता है । इस ब्रह्मासे समस्त संसार है । यह रजोगुण अर्थात् प्रवृत्तिकी प्रतिमूर्ति हैं । बुद्धिरूप ब्रह्मा है । इससे समरत वेद और विद्या संसारमें प्रचलित हैं । इस ब्रह्माका स्थान लिङ्ग छः पत्तोंके कमल सो अधिष्ठान चक्रमें है । यह ब्रह्मा प्रवृत्तिकी कामनाको
यहाँ साहबके सांप्रदायिक कबीर ग्रन्थोंका सम्बन्ध छोड़कर ब्रह्मा और शिवजीपर देवी भागवतके धामक आधारपर लोग स्वतंत्र ही लिख पढ रहे हैं । यद्यपि यों यह ऐसे स्थलोंमें आवश्यक है । उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । परन्तु मनुष्यकी अनन्त भावनाएँ होती हैं । न जाने किस भावनासे लिख दिया करते हैं । यह उनका ही अन्तःकरण जानता होगा । हम ऐसे विषयोंका कितनी ही बार सार्वजनिक समन्वय दिखा चुके हैं । जिन्हें ऐसे प्रकरणोंके रहस्यकी जिज्ञासा हो वो हमारे तिभिरभास्कर आदि ग्रन्थोंको देख लें । यहाँ दिखाना नहीं चाहते । अच्छा होता यदि इन कहानियोंके स्थानपर भक्ति ज्ञान वा स्वयं वेदकी इन्हींके विषयकी बातें होतीं ।