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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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उठाता है। स्वयम् काम कामना भी कहा जा सकता है। इस ब्रह्माका ज्ञान विहारी वह स्वयम् संसारी है। वह स्वयम् अपने कार्योंका अधिकारी नहीं है जो कुछ वह करता है विवश होकर करता है और वह करता है और अपने कार्योंसे डरता फिरता है। जब दैत्योंकी तपस्या पूरी होती है तब उनके सामने जाता है। उनको वरदान देता है उस ब्रह्माके वरदानसे दैत्य प्रबल होकर समस्त देवताओंको ब्रह्मा सहित मारकर भगा देते हैं। ब्रह्मा भी देवोंके साथ भागता तथा दुःख पाता फिरता है। उसका कोई वश नहीं चलता है। यदि यह ब्रह्मा अधिकारी होता तो दैत्योंको क्यों वरदान देता। परन्तु वह विवश होकर वरदान दे दिया करता है। यह ब्रह्मा संसार बढ़ानेकी कामनाओंमें डूबा रहता है। यह ब्रह्मा इतना दुःख पाता है तो भी दैत्योंको वरदान देनेको भागाही जाता है, उसका कुछ वश नहीं। यह जीव आपसे आप अपने कर्मोंका फल भोगता है। उनको रोकनेवाला कोई नहीं। वेदका प्रचार संसारमें ब्रह्माने किया परन्तु वेदके यथार्थ तात्पर्यको वह भी नहीं समझ सका, यदि ब्रह्मा वेदके यथार्थ तात्पर्यको समझता तो निश्चय वेदकी सच्ची शिक्षा देता। यदि इस ब्रह्मामें एकताकी विद्या होती अथवा एकका ज्ञान होता तो महामायाका ध्यान करके अपनी कठिनाइयोंको क्यों सरल किया चाहता। यह ब्रह्मा समस्त सांसारिक रीतोंका सिखलानेवाला है। इस ब्रह्माका हृदय सांसारिक कामनाओंसे भरा हुआ है। अपनी कामनाओंसे खिंचा हुआ बारम्बार जन्म मरणके दुःख कष्टमें फँसा रहता है यह ब्रह्मा इस जगत्के सोचमें पड़ा रहता है। ब्रह्माकी संतान ब्राह्मण हैं। शास्त्र और धर्म-कर्मका प्रचार करता रहता है। यह ब्रह्मदेव मुक्तिका उपदेश देनेवाला कहलाता है। इसीकी शिक्षासे सब जानी तथा ध्यानी होते हैं।

विद्या अविद्या आदि यथेष्टोंका रचयिता ब्रह्मा है। सब ऋषि मुनि इससे उत्पन्न होकर धार्मिक चलन सिखलाते हैं। समस्त सांसारिक पुरुष इसीपर चलते हैं।

देवीभागवतके तीसरे स्कंध की २-३-७ अध्यायमें लिखा है कि, सबसे पूर्व पानी था, दूसरा कुछ नहीं था। अब यहाँ नारदजी अपने पिता ब्रह्मासे पूछते हैं कि, ए पिता ! इस संसारकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मधु तथा कंटभ दो दैत्य विष्णुके कानके मेलसे उत्पन्न हुए। वे जलपर रहा करते, जलही पर उन लोगोंने बड़ी तपस्या की, अत्यंत बलिष्ठ हुए। जब मैं उत्पन्न हुआ तो मैंने अपने आसनके नीचे कमल देखा। मैं इस कमलपर बैठता था कि, दोनों दैत्य दिखलाई दिए, मैं उनको देखकर भयभीत हुआ। उन