कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextदोनोंने मुझको युद्धके निमित्त ललकारा। मैं भयभीत होकर कमलकी नाल पकड़े हुए नीचे उतरा तो सहस्र वर्षपर्यन्त मैं फिरता और चक्कर खाता रहा कुछ ठिकाना नहीं चला। तब मैंने वहाँ बैठकर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या की, तब आकाशवाणी हुई कि, ए मुख् ! तूने अब तक नहीं जाना कि, इस संसारके, रचयिता कौन है ? तब उसीमें फिरते हुए नीचेको गया तब मुझको आसमानी रङ्गका एक स्वरूप जिसके चार भुजाएँ थीं जो पीताम्बर पहने था, दिखलाई दिया। शेषजीके ऊपर सोया हुवा और वनमाला उसके गलेमें थी। शंख चक्र गदा पद्म लिए हुए अंचेत योगनिद्राके वशीभूत दिखलाई दिया। इस पुरुषको देखकर मैं निद्राशक्तिकी स्तुति करने लगा। तब उसके शरीरमेंसे भगवती देवी निकल पड़ी। तब मैं उस रूपको देखकर निर्भय होगया। जब भगवती निकल पड़ी। तब भगवान् जागे। पाँच सहस्र वर्ष पर्यन्त उन दोनों दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका वध किया। पीछे उस शक्तितने जो भगवान्के शरीरसे निकली थी यह कहा कि, हे ब्रह्मन् ! समस्त संसारका स्तंभ मैं हूँ। ये दैत्य जो मारे हैं इनकी उत्पत्तिका कारण भी मैं हूँ। अब तू भली भाँति जगत् की उत्पत्ति कर। यह कहकर वह शक्ति भगवान्के शरीरमें समागई। इतनी बात सुनकर ब्रह्मा कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा मनमें सोच विचार करने लगा कि, मैं किस प्रकार सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? मुझको तो कुछ दिखलाई नहीं देता अब मैं किससे पूछकर सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? ब्रह्मा इस ध्यानमें बहुत गोता खा रहा था। तब उसने देखा कि, एक विमान आकाशसे उड़ आया उसके बराबर बैठ गया। उसके ऊपर भगवतीजी महारानी अपनी शक्तियों सहित बैठी हैं। इस विमानको समीप विष्णु और शिवको खड़े देखा।
तीसरा अध्याय—फिर नारदने ब्रह्माजीसे कहा कि, हम तीनों देवता जाकर इस विमानके एक डण्डेपर बैठ गए। तब वह विमान वहाँसे उड़कर एक भूभागपर आया। वहाँ जल नहीं था। परन्तु अनेक प्रकारकी वाटिका वृक्ष और बड़े सुन्दर मनुष्य बावड़ीं कुएँ इत्यादि और अनेक प्रकारके मकान तथा मन्दिर इत्यादि देखे। तब हमने एक मनुष्यसे पूछा कि यह कौन लोक है। तब उसने उत्तर दिया कि, यह स्वर्गलोक है। वहाँ एक मनुष्य राजा इन्द्रके सदृश दिखलाई दिया। एक क्षण वहाँ ठहर कर विमान पुनः आगे बढ़ा तो एक नन्दन वनमें पहुँचा। वहाँ सहस्रों प्रकारके पुष्प थे। बड़ी सुगंधि आती थी। चार दांतवाले हाथी थे। सहस्रों परियों नाचतीं और गंधर्व लोग गीत गाते और बाजा बजाते थे। तूबा वृक्ष तथा कल्पवृक्षोंकी बड़ी सुगंधि आती थी। वहाँ एक बड़ा सुन्दर नगर