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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बूहती कहते हैं । उसके स्वामीको बूहस्पति कहते हैं । इस तरह यह स्वसंवेदके प्रगट करनेवाले सत्य पुरुषका नाम होता है । देवोंको देवगुर स्वसंवेद सुनाते रहते हैं । इस कारण ये भी उसी नामसे बोले जाते हैं । वेद और पुराणोंमें इनके अनेक तरहके आख्यान मिलते हैं । ताराके विषयको लेकर ये विशेष प्रसिद्ध हैं । कहीं २ तारा इनकी स्त्री तथा कहीं उसी प्रकरणमें तारा करके ब्रह्म विद्याका स्मरण किया है । शुक्र तेजको कहते हैं । इससे परमात्माका ग्रहण होता है ये अपने तेज तपस्या तथा दिव्य बलसे दैत्योंको तेजस्वी बनाये रहते हैं । इस कारण ये शुक्र कहलाते हैं ये दोनों सत्यपुरुषके नामोंसे बोले जाते हैं, यदि इनके सूक्ष्म जीवन पर विचार किया जाय तो ये गुरुपनेकी दशामें भी सत्य सच्चिदानन्द सत्य पुरुषके अत्यन्त समीपी प्रतीत होते हैं ।

नारद ।

जहां सच्चिदानन्द भगवान्के अनन्य भक्तोंका प्रसंग आ उपस्थित होता है वहां नारदजीकी खड़ी चोटीकी मूर्ति आ उपस्थित होती है । वेद पुराण कोई भी इनसे बाकी नहीं है । सब जगह इनका कुछ न कुछ प्रकरण अवश्य मिलता है कहीं कहीं तो यह भी लिखा मिलता है कि, यह सत्य पुरुषका मनही है । ज्ञानेच्छुओंको ज्ञान, भक्तिके प्यासोंको भक्ति एवम् लड़ाईके प्यासोंको घोर समर, दिलाना इनका कार्य रहा है । भक्ति से सब साधनोंके उपदेश इन्होंने अपने शरीर पर घटाकर दिये हैं । यहां तक बता दिया कि, सब कुछ जीत कर भी जीतके अभिमानको जबतक नहीं जीता तब तक कुछ भी नहीं है । नारदके मोहके प्रकरण सब इसी बातके उदाहरण हैं । ये सत्य पुरुषके समीपी तथा स्वसंवेदके प्राकट्य करनेवालोंमें एक हैं । शब्दोंसे भगवान्को रिझाने और स्मरण करने का कार्य उन्होंने प्रारंभ हुआ है । नारदीय शिक्षा तथा स्मृति एवम् भक्तिसूत्र आदि इन्होंने बनाए हुए भक्तिपथके परिचायक हैं । कबीरदासजीने भी इन्हें सिद्ध सुरुषोंमें मानकर स्मरण किया है ।

सन्तो मते मात जनरंगी ।

पीवत प्याला प्रेम सुधारस, मतवारे सतसंगी ॥ १ ॥

अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी, ब्रह्म अगिनि उदगारी ।

मून्दे मदन कर्म कटि कसयल, सन्तत चूवे अभारी ॥ २ ॥

सच्चिदानन्द रामके सच्चे उपासक जिनके गुरु हैं ऐसे अथवा सुरति कमलपर बैठकर जो रकार बीजका उच्चारण करते हैं उन सिद्ध पुरुषोंके मुखसे वहाँ सुननेवाले पूरेरंगे पुरुष सन्त पुरुषोंके सिद्धान्तोंमें मस्त रहते हैं । क्योंकि,