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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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सतसंगी पुरुष रामचन्द्रजीकी प्रेमलक्षणा पराभक्तिरूप अमृतके प्यालेको पीते हैं और उसीके नशामें संसारको भूले हुए ध्येयके रूपमें निर्विकल्प रहते आते हैं। और प्रेम मदिरा कैसे तैयार की जाती है ! इस पर कबीर साहिब कहते हैं कि जैसे शराब खीचनेके लिये ऊपर नीचे दो हुन्डे नीचे ऊपर रखकर नली लगाकर खींच लेते हैं, इसी तरह प्रेम मदिरा खींचनेके लिये, ऊपर और नीचेके लोकोंके सारासारका विवेक कि, इनमें सार क्या तथा असार क्या है ! इसे लेकर भाठी-भट्ठी यानी लौरूपी भाठी रोप दी और ब्रह्मके स्वरूपके ध्यानरूपी अग्नि जला दी। मदन-महुआ और कामको कहते हैं जैसे-उन दोनोंमें महुआ भरा जाता है, उसी तरह कामका निरोध करनेपर कर्मरूपी मैलके निकलजाने पर सामनेही बुद्धिरूपपात्रमें निरन्तर चुबाने लगी।

गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि, नारद शुक् मुनि जोरी।

सभा बैठि शंभू सनकादिक, तहाँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥

अम्बरीष औ याज्ञ जनक जड़, शेष सहस मुख पाना।

कहलों गिनो अनन्तकोटि लै, अमहल महल देवाना ॥ ४ ॥

इस प्रेम मंदिराको गोरख योगी, दत्तात्रेय, वशिष्ठ, व्यासदेव, शुक्ताचार्य्य और शुक् मुनिने इकट्ठा किया। यानी ये सब प्रेमरूपा पराभक्तिके ही उपासक थे। एवम् वही इन्होंने पूर्वोक्त भट्ठीपर खींची थी। जिस सभामें शंभू और सनकादिक बैठते हैं वहाँ वो प्रेम मदिराकी भरी कटोरी अपर-फिरती रही यानी उसे ये हाथों हाथ पीगये इतना भी सीकीको अवकाश नहीं मिला कि, उसको जमीनपर टेक तो लेता। अथवा जो रस मन वाणीमें न आये पान करते ही सब छक जायें वो रस इन्होंने पिया। अम्बरीष, याज्ञवल्क्य और जडभरत इन्होंने उसे पिया तथा शेषनाग हजार मुखसे पीगये। उस प्रेम मदिराके पीने-वाले अनन्त कोटि हैं जो सत्य पुरुषके सत्यलोकमें भी प्रेममदिरा पीकर अप्राकृत महलोंमें दीवाने बने बैठे हैं। अथवा निर्गुण और सगुण दोनोंसे विलक्षण केवल भक्तोंके लिये ही सब कुछ बने हुए हैं। प्रेम मदिराके दीवाने भक्त उसी सच्चिदानन्दमें निमग्न रहते आते हैं।

ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते, माती शिवकी नारी।

सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन, अनहुँ न छूटि खुमारी ॥ ५ ॥

सुर नर मुनि जेते पीर ओलिया, जिनरे पिया तिनजाना।

कहें कबीर गूंगे को शक्कर, क्योंकरि करे बखाना ॥ ६ ॥

इस प्रेमरूपी मदिराको पीकर ध्रुव प्रह्लाद और विभीषण तथा पार्वती