कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextप्रह्लादको दंड देना आरंभ किया। प्रह्लादको हिरण्यकशिपुने पर्वतपरसे नीचे डाल दिया, हाथी झँकाया, अग्निमें डाल दिया और और अनेक दंड दिए, परन्तु जब प्रह्लादको दंड देता था तब विष्णु प्रह्लादको सामने खड़े दिखाई दे समस्त कठिनाइयोंको रोक लिया करते थे। पर दूसरे किसीको दिखलाई नहीं देते थे। विष्णु प्रह्लादको इक्षित करते जाते थे कि, भयभीत न होना, सशंकित होनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं तेरा रखवाला तेरे सामने खड़ा हूँ। हिरण्यकशिपु प्रह्लादको स्तंभसे बाँधकर वधपर प्रस्तुत हुआ। तब स्तंभ फाड़कर वे नृसिंहजी निकल पड़े। हिरण्यकशिपुका वध किया, प्रह्लादको राज्य दिया। जब प्रह्लादजी-पर कठिनाई आन पडती, तब तो विष्णुका ध्यान करते और “विष्णु विष्णु” पुकारते और जब वह बाधा टलजाती तब वेदशास्त्रानुसार अपने स्वरूपका ध्यान करते। ऐसे विचारोंको देखकर विष्णुने प्रह्लादकी निष्ठा बढ़ानेके लिये कहा कि, ए प्रह्लाद ! कठिनाईके समय तो तू मुझे पुकारता है। जब बला टल जाती है तब तू अनुमान करता है कि, समस्त संसार मैं ही हूँ मैं ही हूँ समस्त संसार मेराही स्वरूप है। यदि समस्त संसारमें तूही तू है तो आपत्तिकालमें मुझको क्यों पुकारता है। तेरे चित्तकी दुविधा नहीं गई फिर विष्णुने प्रह्लादको सिंहासपर बैठा दिया तथा प्रह्लादके उत्तरको सुनकर परम प्रसन्न हुए। ये भी प्रेम मदिराके दीवाने हैं।
अम्बरीष ।
जब भक्तोंकी कथाएँ चलती हैं तो भक्तवर राजर्षि अम्बरीषकी जीवनी भी आखोंके सामने आ खड़ी होती है। ये परम भक्त थे सब कुछ होते हुए भी अपनेको भक्तोंके चरणकी धूलिही समझते थे। यद्यपि ये भक्त गोष्ठीसे तो छिपे हुए नहीं थे पर ऐसी घटना घटी कि, ये सर्व साधारणकी दृष्टिमें आगये। दुर्वासा ऋषि बड़े तपस्वी तथा अत्यंत क्रोधी थे। एक बार राजा अम्बरीषके गृह आप पधारे और वे राजा बड़े भक्त थेही और ठाकुर पूजा करतेही थे। राजाने ठाकुरका चरणामृत लिया तब दुर्वासाको अत्यंत क्रोध आया कि, विना मुझे भोजन कराए तूने चरणामृत क्यों लेलिया ? मैं तुझको शाप दूंगा। तब राजा हाथ बाँधकर खड़ा हो बोला कि, महाराज ! मेरा अपराध क्षमा करो। दुर्वासा ऋषि अत्यंत क्रोधमें थे। जब उन्होंने उसे मारनेके लिये कृत्या उत्पन्न की तो उस समय विष्णुका चक्र सुदर्शन दुर्वासाके ऊपर छूटा कि, भस्म करदो। तब दुर्वासा भागा। जहाँ जाते थे वहाँ चक्र सुदर्शन दुर्वासाके पीछे जाते। जब दुर्वासाने देखा कि, यह चक्र सुदर्शन मुझको न छोड़ेगा तब विष्णुके शरण गए कि,