BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 399 of 1367

Read in context
Page 399

मुझको चक्र सुदर्शनसे बचाओ । तब विष्णुने कहा कि, ए दुर्वासा ! तुम राजा अम्बरीषके शरणमें जाओ । तुमने भक्तसे क्यों वैर किया तब दुर्वासा भागकर राजाके शरणमें आए, राजासे अपना अपराध क्षमा करवाया । राजाने चक्र सुदर्शनकी बड़ी स्तुति की । चक्र सुदर्शन शान्त हुवा । दुर्वासाके प्राण बचे । कबीर साहिबने इन्हें भी परा भक्तिरूपी प्रेम मंदिराका दीवाना मानकर अत्यन्त आदरके साथ स्मरण किया है ।

भगवान् शुक्देव ।

प्रेम मंदिराके दीवानोंमें व्यासपुत्र शुक्देवजीका नाम बड़े आदरके साथ लिया जाया करता है । ऋषियोंमें वामदेव और शुक् सत्यलोकवासी संभाले जाते हैं । देवीभागवतमें इन्हें अयोनिज तथा अरणिसे उत्पन्न हुआ कहा है । ये किस तरह प्रकट हुए इस प्रकरणपर विचार किया जाता है । जब व्यासजी सरस्वती नदीके किनारे गए देखो देवीभागवत १-स्कंध, ४-अध्यायमें इस प्रकार लिखा है कि, इस नदीके तटपर बैठकर तपस्या करने लगे उस समय आपके मनमें किसी प्रकारकी कामना नहीं थी । इस नदीतटपर गुलबंग नामक एक पक्षी रहता था, इस गुलबंगकी स्त्री गर्भिणी थी, अल्पकालके उपरान्त उसको बच्चा उत्पन्न हुवा । बच्चा जन्मनेसे गुलबंग अतिहर्षित हुवा, बारम्बार बच्चेको चाटने और प्यार करने लगा । इस पक्षीको देखकर व्यासजीके मनमें यह कामना उत्पन्न हुई कि, यदि मेरा पुत्र भी उत्पन्न होता तो कैसा अच्छा होता, कारण, यह कि, बिना पुत्रके गति नहीं । इस समय व्यासजीके बुढ़ापेका समय था, समस्त पुराण और वेद महाभारतादि बनाचुके थे । तब इस नदीतटपर पुत्रकामनासे तपस्या करने लगे । तब समस्त देवतागण प्रसन्न हो, व्यासजीके सामने आए । तब नारदजीने व्याससे कहा कि ए व्यास ! सब देवता भगवतीके पूजनसे अपने मनोरथको पहुँचते हैं इस कारण तुम देवीका पूजन करो । तब नारदके उपदेशानुसार वे भगवतीकी वंदनामें लगे ।

फिर देखो दशवें अध्यायमें लिखा है कि, व्यासजीने पर्वतकी चोटीपर जाकर समाधि लगादी । जब आधी तपस्या होचुकी तब राजा इन्द्रको भय उत्पन्न हुवा कि, व्यास जो कठिन तपस्या कर रहा है कहीं मेरा सिंहासन नछीनले, और शिवजीसे जाकर कहा तब शिवजीने समझाया कि, तुम भय न करो । व्यासजी बरदान लेकर अपने स्थानपर आये वहाँ अग्निहोत्रके लिये अरणि मथन करते सोचने लगे कि जैसे नीचेकी अरणिसे मन्थाके संयोगसे मथनेसे अग्नि प्रकट हो जाता है, इसी तरह मुझे भी पुत्र मिलजाय । इसके साथही गृहस्थाश्रम