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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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लिये राज्य कर रही है । तीनों शिकारी रज तम सत्त्व जाल लगाकर शिकार खेलते फिरते हैं । इसी विराट्के पेटमें कबीर साहब अपनी नाव लिये फिरते हैं । चारों युगसे बराबर पुकारते आते हैं कि, ए मनुष्यो मेरी नावपर सवार हो मैं तुमको पार उतारूँगा । कोई भाग्यवान दौड़कर उस नावपर सवार होता है । उसका बेडा पार होता है, समस्त मनुष्य इसी विराट्पुरुषकी पूजामें संलग्न रहते हैं । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, यह विराट्पुरुष कौन है । किसका अवतार है उसकी बंदनासे कौनसी श्रेणी प्राप्त होती है ! इस विराट् पुरुषका शरीर उनचास करोड़ योजनका है । उसका शरीरही यह भवसागर है । ग्रंथ कबीरवाणीमें कबीर साहब कहते हैं —

बारह पालग कूर्म शरीरा । षट् पालङ्ग देहधर्म धीरा ॥

धर्मधीरा और धर्मराय इत्यादि नाम इसी विराट्पुरुषके हैं ।

षट् अर्थात् छः पालङ्गका उनचास करोड़ योजन होता है । इतना बड़ा शरीर इस विराट्पुरुषका है । आकाश पाताल और मृत्युलोक इसके भीतर बसे हैं । चारों प्रकारकी मुक्ति इसके वशमें है जो कोई इस विराट्की आज्ञानुसार भलाईको उच्च श्रेणीपर पहुँचावे वह चारों मुक्ति संसार, धन, राज्य, और वैकुण्ठ इत्यादिका अधिकारी हो जाता है । जो कुछ विराट् पुरुषके शरीरमें है वही सब मनुष्य देहमें भी है । अतः प्रत्येक मनुष्योंका शरीर इसी विराट्पुरुषका शरीर है । यद्यपि उससे छोटी दिखाई देती है, जो कुछ विराट्में वही गुण ब्रह्माण्डके भीतर है । कुछ न्यूनाधिक नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों कच्चे हैं । जबलों यह जीव कच्चा है कच्चे के साथ प्रेम कर रहा है तबतक पक्का पथ कैसे मिल सकता है ? यह पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनों ही झूठे हैं फिर यह झूठा जबलों झूठेसे प्रेम करता है तबलों सच्चेके साथ प्रेम कैसे उत्पन्न हो ? पर इसे भी सत्य पुरुषही समझ प्रेम किया जाय तो यह भी सत्यपुरुषकी ओर ही बढ़ाता है ।

इस विराट्पुरुषने अपना तेज प्रताप और गुण आदि भवानोंको दिए, विष्णुको दिये, राम और कृष्णको दिये और ईसाको भी दिये । सुतरां देवी भागवत में देखो ।

जब महामायाने अपना विराट् स्वरूप देवताओंको दिखलाया तब समस्त देवते औंधे मुँह गिर पड़े ।

शरीर और विराट्की एकता ।

रामचन्द्रने कागभुशुण्डको अपना विराट्रूप दिखलाया । देखो रायमंणमें लिखा है कि, जब कागभुशुण्ड अयोध्यामें गये तब रामचन्द्र छोटे बालक थे, दूध