कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसन्तो राह दुनों हम डीठा ॥
हिन्दू तुरक हटा नहि मानें, स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥
हिन्दू व्रत एकादशी साधें, दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागे मन नहि हटकें, पारनकरें सगोती ॥ २ ॥
तुरक रोजा नवाज गुजारें, विसमिल बाँग पुकारें ।
उनकी भिन्नत कहाँते, होइहै, साँझै मुर्गी मारें ॥ ३ ॥
हिन्दुकि दया मेहर तुरकनकी, दूनों घरसों त्यागी ।
वै हलाल वै झटका मारें, आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दू तुरक कि, एक राह है सद्गुरु है बताई ।
कहहि, कबीर सुनो रे सन्तो, राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥
ए महात्मा पुरुषो ! हमने हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही रासता देखी है । मैं हिन्दू और मुसलमान दोनोंको समझाता हूँ पर दोनोंही जिदपर आये हुए हैं कहना नहीं मानते । दोनोंको इसकी चोट लगी हुई है । हिन्दू पहले दिन तो एकादशीका व्रत दूध सिंघाड़ेसे करते हैं अन्नका तो त्याग करते हैं पर मनके विकारोंको छोड़कर मनको नहीं रोकते । न कभी एकादशीको विषय चिन्तन ही छोड़ा है । इसी तरह तुरक जब रोजा करते हैं उस दिन उपवास करते हैं नंमाज पढ़ते हैं, बाँग लगाते हैं, पर साँझको रोजाके खुलतेही मुर्गी मार पुलाक बनाकर खा जाते हैं । हिन्दुओंने दया तथा तुरकोंने मिर्ह, अपने अपने दिलसे निकालदी, एक हलाल करता है तो एक झटका मारता है । अज्ञानरूपी आग दोनोंके लगी हुई है । सत्यगुरुने मुझे यही बताया है कि, हिन्दू मुसलमान दोनोंकी एकही राह है । राम न कहा खुदा कहलिया, एवं खुदा न कहा राम कह लिया । दोनों नाम उसीके हैं सिर्फ नामोंमें अन्तर है । कबीर साहिब कहते हैं कि, राम और खुदाने किसीसे नहीं कहा हैं कि, जीवहत्या करो ।
शब्द—सन्तो पांडे निपुण कसाई ॥
बकरा मारि भैंसाको धावै, दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥
करि स्नान तिलक करि बैठे, विधिसों देबि पुजई ।
आतमराम पलकमो विनशे, रुधिरकी नदी बहाई ॥ २ ॥
अति पुनीत ऊँचे कुल कहिये, सभा माहि अधिकई ।
इनसों दीक्षा सब कोई मोंगे, हसि आवे मोहि भाई ॥ ३ ॥
पाप कटनको कथा सुनावै, कर्म करावै नौँचा ।
बूडत दोउ परस्पर देखे, गहे हाथ यमखौँचा ॥ ४ ॥