भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

मूर्तिमें किसी प्रकारकी विभिन्नता हो जाती है परन्तु प्रकृति बदल नहीं सकती है। जो पहले महामद था, वही अब मुहम्मद है इस तरह पश्चिमके दर्शन पूर्वके दर्शनोंकी छायायें हैं।

पर बलिप्रदान करनेवाले यह समस्त संसारी कालपुरुषकी पूजा करते हैं एवं जितने मनुष्य कालपुरुषका पूजन करते हैं वे सब निश्चय बलिप्रदान करेंगे या करते आए हैं कारण यह कि, कालपुरुषका भोजन जीव हैं वह काल पुरुष तो जीवोंहीके भोजनसे प्रसन्न होता है ॥

जो कोई दरिद्री तथा धनविहीन होता है वह भिक्षा माँगता फिरता है। जिसके घरमें असीम सम्पत्ति भरी होगी वह किसीका भिक्षुक क्यों होगा कारण यह कि, मेरे पिताने मुझे एक बृहत् भण्डार प्रदान किया है। वह भण्डार सूक्ष्म वेद है। जिसमें समस्त विवरण है। मैं किसीके विवरण अथवा अर्थ बतानेका कदापि इच्छुक नहीं हूँ।

मैं तो उनकी बातोंपर तनिक भी विश्वास नहीं करता मैं तो कबीर साहबकी बातोंको सत्य जानता हूँ। जो लिखावट तथा बातें सत्यगुरुकी बातोंके अनुसार हों उसको भी मानता हूँ। जो लिखावट तथा विवरण कबीर साहबके विरुद्ध हो उसकी ओर मैं कदापि दृष्टि नहीं फेरूँगा क्योंकि, जो लिखावटें श्रेष्ठ वचनके विरुद्ध हैं वे यमजाल हैं।

यदि सहस्र अंधे एक हाथीका हूलिया (स्वरूप) बतावें उन सहस्र अंधोंसे एक दृष्टिवाले सचक्षुको मैं अच्छा जानता हूँ। सहस्र नेत्रवालोंसे एक विद्वान्के विवरणको ठीक जानता हूँ। सहस्रों विद्वानोंसे एक विद्वान् गुणीको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों गुणी विद्वानोंसे एक ज्ञानीको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों ज्ञानियोंसे एक भक्तको अच्छा समझता हूँ। सहस्रों भक्तोंमें एक ब्रह्मज्ञानी अर्थात् जो गुणी मनुष्य लुढ़नी विद्यासे सुशोभित हैं उसको सर्वोत्कृष्ट मानता हूँ, जितने तीन लोकके ब्रह्मज्ञानी हुए, अथवा होंगे सबके गुरु तथा पथदर्शक कबीर साहब हैं। कबीर साहबको मैं स्वयम् सत्यपुरुष मानता हूँ। मेरा यह विश्वास अटल है। मैं इन्हीं महाशयके वाक्यानुसार सब कुछ लिखता हूँ।

यह सत्यगुरु सदैवसे पुकारते और मनुष्योंसे कहते आए कि, ए मनुष्यो ! कालपुरुषसे बचो, वह तुमको फँसाकर मारनेवाला है। वह तुम्हारी मुक्ति कदापि होने न देगा। वह काल महाभयानक है।

बलिका निषेध।

कबीर साहब किसी भी प्रकारकी बलि या कुर्बानीको उचित नहीं मानते। कोई भी हत्या पापसे खाली नहीं है।