कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextअनुग्रह हुआ । ऐसे साहबको जो न पहचाने उसके दुर्भाग्य ही समझने चाहिये । यह ऊपर कहे हुए मुसदूतका सार है ।
राजा योगधीर ।
यह राजा सत्ययुगमें था । उसके घर सत्य सुकृतजी (कबीर साहब) गए और वह राजा बड़ा अभिमानी था वेदपाठी भी था । दूसरोंको बहुत कुछ उपदेश दिया करता था । बारह वर्षपर्यन्त सत्यसुकृतजी महाराज उसको सिखाते रहे । वह बारह वर्ष पर्यन्त तलवार लेकर मारनेको दौड़ा । सत्यगुरुने समझाया कि, ऐ राजा ! इस पृथ्वीपर बड़े बड़े राजा हो गए । ऐसे बलिष्ठ तथा प्रभावशाली राजे थे कि, तारोंके समान उनके पास अश्व थे । वे ऐसे शीघ्रगामी तथा तेज चलनेवाले थे कि, तीन पगमें समस्त पृथ्वीको समाप्त कर जावे । एक पलभर में सहस्रों कोश उड़ जावे । सो सब मरकर कालके गालमें जावसे । तू उनके सामने क्या वस्तु है ! ए राजा ? तू इतने घमंडमें क्यों है । यह किसीका नहीं रहा है ।
एक दिन लोग राजाके पास आए निवेदन किया कि, ऐ राजा ! हमको यह बड़ा दुःख है कि, हमारी मुक्ति किस प्रकार हो, आवागमनसे कैसे छूटें ? तीनों तापोंसे किस प्रकार बचें ? कालका बड़ा भारी भय है । हमको इससे कौन बचावे ? आप तो हमारे महाराजा हो, । हमको कालके भयसे बचाओ । आप हमारे धनी तथा स्वामी हो, हमें इन दोनों दुःखोंसे बचाओ । एक गर्भमें आने तथा दूसरे अग्निदाहसे आप हमारी रक्षा करें ।
राजा योगधीर वचन ।
चौ०-राजा कह मैं बड़ा अभाग । यही दुःख मोहूको लाग ।
जो कोइ इनसे लेइ छोड़ाई । ताको पावैं हम धरहीं भाई ॥
गरभ वास जो मेटें फेरा । मैं अब होउं उन्हींका चेरा ॥
राजाने कहा कि, ऐसा कौन है जो आवागमनका दुःख दूर करे, बड़े बड़े सिद्ध साधु ऋषि मुनि और देवता इत्यादि आवागमनके बंधनमें पड़े हैं । मेरे मनमें बड़ी चिन्ता है कि, गर्भमें आनेकी बात कैसे छूटे ? तब लोगोंने समझाया कि, ऐ राजा ! सुन । सत्य सुकृतजी महाराजमें यह बल है दूसरोंमें नहीं, वह तो स्वयम् पुराण पुरुष हैं । इस सर्वशक्तिमान्का लोक जुदा है । तीनों गुण अपार हैं इस साहबका देश पर है । यह तीनों लोक तीनों गुणोंके अधीन हैं । इस सत्य-