कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुझपर बड़ी कृपा की । जो कि, मुझे अपने आप आकर दर्शन देदिया, आपने कौवेको हंस बना दिया । एवं भवसागरमें डूबते हुए को बचा लिया ।
सोरठा—सद्गुरु चरण मयंक, चित चकोर राजा निरखि ।
कीन्ह मोहि निःशंक, जरा मरण भ्रम मिटि गयो ॥
सद्गुरुके चरणरूपी निष्कलंक चन्द्रमाको राजाका चित्तरूपी चकोर निश्चल भावसे देखने लगा और बोला कि, हे गुरो ! आपने मुझे निशंक कर दिया मेरे जरा, मरण और भ्रम सब मिट गये ।
मुस०—करे को रहम तुझविन आसियाँ पर । नजर जिसकी नशत नियत जयाँपर ॥
कि है तू साहबांका साहब आला । वहाँ सत्पुरुष सो सद्गुरु यहाँ पर ॥
जिसे तूने अजर जामा पिन्हाना । हवस उसको नपाशिश परनियाँ पर ॥
बिखेरादाना महसूसात सैयाद । बदामें वेदबानीके बयाँपर ॥
लगाया मुहू तूने जिस्पे उसको । नजर क्या मार्ग रुहे माकियाँ पर ॥
तू है कबीर सबका दीनों ईमाँ । पतितपावन है शपफूररहीमाँ ॥
नैवाजिशकी निगह कुल आलमो पर । बजब्वारो अफू भी जालिमों पर ॥
खता कारों गुनहगारोंको बखशे । रहमतू क्योंन करतुम तालिबोंपर ॥
मनी और किन्नकी वू देख जिसमें । महरने है कहर सब गालिबों पर ॥
करेपर खाकसार इल्मों अमलसे । रतनबखशीलफिरोतनकालिबोंपर ॥
नजर हो मेह्तुझ जिस बद गुहर पर । बढावे दरजः सदहा सालिहोंपर ॥तू॥
न जाना होश मन्दाने जमानः । बसर कर जिन्दगानी जाहिदान ।
रेयाजंत ओ इबादत शाफ फ़ाकः । करोड़ों जन्म बीते इह वहानः ।
न पाया भेद इसरारे निहानी । फिर हर दर व हर खाने बखानः ॥
हुआ रहबर तु जिसका आपही आप । तेरी रहमत बना नाम निशानः ॥
दिखावे रह बजुज तुझ कौन आजिज । बतारीकी फिरे सब अबलहान ॥
तू है कबीर सबका दीनों ईमा । पतित पावन शपफूररहीमाँ ॥
हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, नमरुद, शद्वाद, फिरऊन इत्यादि तो ऐसे अत्याचारी न थे जैसा कि, यह राजा था । यह तो इनसे बहुत बढ़कर था । कैसे अत्याचार तथा पापसे पृथ्वीको भर दिया निर्दोषोंके रक्तसे लाल कर दिया । देखो दयालु सत्यगुरुने उस परभी दया की कि, उसको उसके आत्मसंबंधियों सहित परम धामको पहुँचा दिया । इसी साहबका नाम दयालु तथा निर्दोष हैं । अन्य किसीका कदापि नहीं हो सकता । यही साहब कुल श्रेष्ठ गुणोंसे विभूषित हैं । दूसरा कोई नहीं है । जो नितान्तही क्रोधसे योग्य था उस पर ऐसा