कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextराहमें जब चले जाते थे, कालके दूतने एक ऐसा कौतुक दिखाया कि, सुकृतजीके साथ जितने हंस थे उतनेही रूप धरकर यमके दूत आये । वैसेही छापा तिलक आदि सब कुछ बनाकर कहने लगे कि, हे हंसगणो ! हमारे साथ चलो । तब हंसोंने उत्तर दिया कि, हम तुमको भली प्रकार पहचानते हैं कि, तुम ठग बटमार हो हम तुम्हारी बातें नहीं सुनते। हम तो जिनके हंस हैं उन्हीं साहबके पास जावेंगे । हम तुम्हारी दगाबाजी भली प्रकार जानते हैं । तुम्हारे धोखेमें कदापि न आवेंगे । सत्यगुरुने समस्त हंसोंको लेकर सुकृतसागर पर पहुँच कहा कि, सब हंस अब इसमें स्नान करो, तब सभीोंने वहां स्नान किया । जिससे उनको सब द्वीपोंका ज्ञान होगया । लोकमें पहुँचकर सुकृतजीके चरणोंमें गिरकर नमस्कार किया, पश्चात् हंसोंका दर्शन किया, सुकृतजीने कहा कि, हे राजा ! अब तुम अपने राज स्थान को पलट चलो । राजाने कहा कि, हे सत्यगुरु ! अब हम यहाँ ही रहेंगे, पृथ्वी पर न जावेंगे, यहाँ चार दिन बीत जानेपर चौपदार राजमहलमें गये तो वहां क्या देखते हैं कि, महल शून्य पड़े हैं न राजा है न कोई रानी है, न राजाके पचास पुत्र हैं न राजाकी पुत्री है, समस्त महल शून्य देखकर रोता हुवा बाहर आया, लोगोंको समाचार दिया । राजाके आत्मसंबंधी, मंत्री तथा अन्यान्य कर्मचारी गण आये । देखा तो राजमहल शून्य पड़ा है । कहीं कोई नहीं यह देख कर सब रोने लगे कि, राजाको उनके संबंधियों सहित किसने मार गया, कहाँ गए, कौनसी आपत्ति उन पर आई ? चौबदारने मंत्रीसे कहने लगा कि, एक जिन्दा फकीर आया था । उसने राजाको ऐसा कौतुक दिखलाया । हमने कहा था कि, यह जिन्दा सत्यानाश करनेको आया है । सो राजाने, उस जिन्दा फकीर पर विश्वास करके अपना सर्वस्व अपहरण करवाया, उसीका विष बोया हुआ है । धर्म-दासजीसे कबीर, साहब कहते हैं कि, हे धर्मदास ! जैसा यह राजा सत्यवादी हुआ तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पन किया, वैसेही को नाम बताओ दूसरोंसे उपेक्षा करो, क्योंकि सच्चेही जीव सत्यलोकको जावेंगे । झूठोंके लिये सत्यलोक नहीं है ।
राजा अमरसिंह ।
कबीर सागर नं. ४ में बोधसागर है । उसमें एक प्रकरण अमरसिंहबोध भी है । उसमें जो लिखा है उसीका सार लिखते हैं । ज्ञानीजीसे सत्य पुरुषने कहा कि, बहुत दिन बीते । कोई भी जीव सत्यलोकको नहीं आया । कालपुरुषने सब जीवोंको रोक रक्खा है, विहंगम मार्ग बतलाकर सब मनुष्योंकी मुक्ति कराओ । जब पुरुषने ज्ञानीजीको आज्ञा दी थी उस युगका नाम कसोद था । ज्ञानीजी सत्य-