BharatKosha
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 570 of 1367

Read in context
Page 570

पुरुषको नमस्कार करके पृथ्वी पर आ सिंहलक्ष्मीपमें उतरे । वहाँके राजाका नाम अमरसिंह था, अमरावतीमें रहता था । उसकी रानीका नाम स्वरकला था । वहाँ पर ज्ञानीजी गये उसको यह कौतुक दिखाया कि, राजाने ज्ञानीजीको सोलह सूर्यके समान ज्योतिमान तथा प्रकाशित देखा । ऐसी सुगंधि उठने लगी कि, मस्तिष्क भर गया । राजा अमरसिंहने उस स्वरूपका दर्शन किया, परन्तु दर्शन देकर ज्ञानीजी अन्तर्धान होगये । राजा उन्हें दूढ़ने लगा, खोज करता करता थक गया, कहीं पत्ता नहीं लगा । राजा ढाढ़े मार मार कर रोने लगा । जैसे जल बिना मीनकी गति होती है वही अवस्था राजाकी हुई । सात दिन रात इसी अवस्थामें बीते राजाने माया मोह तथा राज्यभिमान सभी छोड़ दिया, केवल सत्यगुरुके चरणोंके ध्यानमें लगा रहा । ज्ञानीजी दयालु हुए, पुनः राजाको दर्शन दिया, राजाके सिरपर हाथ रक्खा, जब राजाके मनमें सन्तोष आया तब राजाने कहा कि, आपका दर्शन पाकर मैं सुखी हुआ । जैसे चन्द्रको देखकर चकोर हर्षित होता है; जैसे कि, स्वातीके जलसे पपीहा हर्षित होता है । इतना कहकर सत्यगुरुके चरणोंपर शिर धर दिया । कहने लगा कि, अब मेरा दुःख दूर हुआ । फिर पूछा कि, आप कहाँसे आये हो ? कहाँ रहते हो ? आपका क्या नाम है ? किस लोकमें स्थान है ! मुझसे सत्य कहो, हंसका उबार करी ज्ञानीजीने कहा कि, हम मृत्यु लोकसे आए हैं, वह अमर ठिकाना है वहाँ सत्य पुरुष रहता है हंसभी रहते हैं, हम उस पुरुषकी आज्ञा लेकर आये हैं, जो कोई हमको पहचाने उसको लोकमें भेज देंगे । इतना सुनकर राजा हाथ जोड़कर बोला कि, हमारी मुक्ति करो, हमारे बड़े भाग्य हैं जो पुरुष रूप आपने मुझको दर्शन दिये, अब हमें आप अपने कालसे बचा लीजिए जिससे हम पुरुषका दर्शन कर सकें । ज्ञानीजी बोले कि, हे राजा ! शुद्ध बुद्धि करके परवाना लेकर सत्य पुरुषका निःतत्व ध्यान करो । सत्यगुरुकी दयासे फिर तुमको काल न छेड़ेगा । राजाने रानीसे कहा कि, अब तुम सत्यगुरुके चरण पकड़ो । क्योंकि चार वेद जिसको नित्य गाते हैं इस सत्यगुरुका भेद वे भी नहीं जानते हैं । सत्य सत्यगुरु अखण्ड पुरीमें रहते हैं । उनकी गम्य काल नहीं पाता । हे रानी ! चित्त लगायके दर्शन करो तो तुम्हारे अनेक जन्मोंके पाप कटें, ऐसे सन्त कभी नहीं आये । हमारे बड़े भाग्य हैं कि, सत्यगुरु हमारे घर पधारें । रानीने कहा कि, हे महाराज ! समझ बूझकर गुरु करो, जिसमें फिर पीछे पछ्ताना न पड़े । तब राजा ने कहा कि, हे रानी ! ऐसे सत्यगुरु कहाँ हैं ? हम तन मन धन सब सत्यगुरुको अर्पण करेंगे । हे रानी ! समस्त लज्जाओंको छोड़कर सत्यगुरुके चरण जल्दी पकड़ो. नहीं तो कुत्ते बिल्लीका जन्म होगा । तब रानी अपनी दासियोंसहित

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · Page 570 of 1367 · BharatKosha