कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextगण गंधर्व देव सब आये । श्वपच भक्तको मस्तक' नाये' ॥
सब शट दर्शन और अचारी' । अस्तुति करै चरण शिर धारी' ॥
सा०—कल' वन्त बहुतेक जुरे', पण्डित कोटि पचीस ।
श्वपच भक्तकी पनही', तुलै' न काहुको' शीस ॥
चौ०—नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठानि रे प्रानी ॥
पढ़े रे भरथरी' चारों वेदा । बिन सद्गुरु नहिं पायो भेदा" ॥
गोरखको भी जन्म सरानी" । कायाकी गति" उनहुँ न जानी॥
जबहुँ जुरे कोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घण्ट अघर" बिच बाजा॥
जबही श्वपच" मन्दिरपगुधारा । बाजेउ घण्ट भये झनकारा ॥
कह कबीर चारों बरण हैनीचा । सबते श्वपचहु भगत है ऊंचा ॥
जब सुदर्शनजीने दूसरी बार भोजन किया तब सात बार स्वयम् आकाशी घण्ट बजा, चारों ओरसे धन्य धन्य और जयजयकार शब्द होने लगा, सम्भस्त राजा प्रजा आकर श्वपच सुदर्शनके चरणोंपर गिरे षट् दर्शनके ऋषि मुनिगण आकर दण्डवत प्रणाम करने लगे पाँचों पाण्डव अत्यंत नम्रतापूर्वक उनके चरणोंपर गिर, स्तुति करने लगे । सुदर्शन महाराजकी महिमा सब संसारमें प्रकट हो गई ।
पाण्डवोंको सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना ।
भीमसेनसे कहा था, कि, जबतक हम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता अपनी आँखोंसे न देखलें तबतक कभी भी विश्वास न करेंगे क्योंकि, कृष्णजीने प्रतिज्ञाकी थी कि, मैं तुमको सुदर्शनकी श्रेष्ठता तुम्हारी आँखोंसे दिखला दूंगा, तुम देख लेना, तब विश्वास करना । इस कारण कृष्णजीने आज्ञा दी कि, अब यह सब समाज जो इस समय उपस्थित हैं पुष्करजी चलें । आज्ञानुसार सब पुष्करजी को चल दिये ।
भगवान् कृष्णने भी जो कुछ कहा था उसको पद्यबद्ध ग्रन्थोंमें दिखाये देते हैं—
ततक्षण' कृष्ण वचन अस" भाखी" । सुनहु न राय युधिष्ठिर साखी" ॥
सबही लैचलु" पुष्कर तीरा" । देखहु दृष्टि" सकल" मतिधीरा" ॥
पुष्कर क्षेत्र आहि" अघहारी" । बेगिहि" चलहु" तहाँ पग धारी ॥
१ शिर, २ झुकाया ३ जोगे जंगम, सेवडा, संन्यासी, दर्बेश, ब्राह्मण, ४ रखकर, ५ सिद्धिवाले, ६ हुए, ७ जूती, ८ बराबर, ९ किसीको, १० भर्तृहरि, ११ हाल, १२ बीता, १३ हाल, १४ आसमानी, १५ श्वपच भी, १६ उसी समय, १७ ऐसे १८ कहे, १९ किसीके कहे हुए, २० लेचलो, २१ किनारे, २२ आँखोंसे, २३ सब २४ बुद्धिमान्, २५ है, २६ पापनाशक, २७ जलदी २८ चल दिये ।