कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextमहान् शोभायमान हो पृथ्वीसे सवा हाथ ऊंचे अधरमें विराजमान हैं, यह देख अपने साथियों सहित राजा आश्चर्यको प्राप्त हो कहने लगा कि, यह तो कोई बड़े अगम्य पुरुष देख पड़ते हैं ! ऐसे पुरुष कभी देखनेमें नहीं आये, पीछे धन्य धन्य कहता हुआ हाथ जोड़कर कबीर साहिबके शरणागत हो सच्चे सुखका अनुभव करने लगा और प्रार्थना करने लगा कि —
छन्द— अस्तुति करत नृप है खडा तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ।
तू अनाथते नाथ कर देव माथ हाथ अनाथ हों ॥
आपनो कर जानि साहब दरश दीन्हें आय हो ।
कीजे कृपा अब दासपर चलो भवन दरश दिखाय हो ॥
सोरठा— कृपा कीन्ह जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ।
विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ।
सद्गुरु वचन ।
चौ०— कहैं कबीर वहाँ नहि काजा । तैं परचण्ड बघेला राजा ॥
काम कोध मद लोभ बढाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥
तूरि सवालख चल सँग तोरे । लाख सवादो प्यादा दौरे ॥
हस्ती चलत सहस दश संगा । निशिदिन भूला काम तरंगा ॥
कञ्चन कलशा महल अटारी । कैसे शब्द गहे नरनारी ॥
हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है वहाँ हमारा ॥
वीरसिंह वचन ।
तुम सहाब हौं दीनदयाला । करमवशी जिव आहिं बेहाला ॥
माया तिमिरनयन पट लागी । दर्शन पाई भये अनुरागी ॥
कर सुदृष्टि आपन कर लीजे । दास जानि आयसु प्रभु दीजे ॥
साखी—भक्तराज दाता अहो, कीजे मोहिं सनाथ ॥
हम आधीन चरन तुव चलो हमारे साथ ॥
राजाके बहुत प्रकारसे विनय करनेपर उसकी सच्ची भक्ति देख कबीर साहबने उसके निवेदनको स्वीकार किया । राजाने बड़े उमंगके साथ अपनी सवारी के गजराजपर साहबको बैठा अनेक तरहके बाजों गाजाके साथ राजमहलको ले चला, हाथीपर भी सतगुरुका आसन उसी प्रकार सवा हाथ ऊंचा था जैसा कि, जमीनपर था । राजमहलमें पहुँच कर सब पटरानियोंमें श्रेष्ठ रानी मानौक देईको बुलाकर राजाने कहा कि, प्यारी ! मैंने कबीर साहबको गुरु किया है, ये आदि-पुरुष परब्रह्मके परम भक्त हैं । तुम चरण धोकर चरणामृत लेओ जिससे