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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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सर्व पाप दूर होकर परम सुख प्राप्त हो । रानीने परदेके भीतरसे कहा कि, महाराज ? आप परमज्ञानी विद्वान् हो, इतनी विनय मेरी स्वीकार करिये । गुरु समझ बूझके करना चाहिये, राजाने कहा, प्यारी ! तुम स्त्री हो सत्यभक्ती नहीं जानतीं । कबीर साहेबकी महिमाको कैसे जानो, साहबकी बड़ी महिमा है, स्वयं सर्वशक्तिवान् परमात्माने भक्तरूप होकर दर्शन दिया है । इतना सुन रानीने बड़े आश्चर्य में आ भक्तिपूर्वक सद्गुरुके चरण पखारकर चरणामृत लिया । फिर नानाप्रकारके व्यंजनोंसे सजा हुआ सुवर्ण थाल लगा राजाके साथ साहिबको भोजन कराया । पीछे सद्गुरुके साथ राजा दरबारमें आया, साहबको राजाने ऊँचे सिंहासनपर बैठाया । नामदेवजी प्रथमहीसे वहाँ उपस्थित थे, वे भी साहब के निकट आकर बैठकर पूछने लगे कि, हे साहब ! आपने शब्द कहाँसे पाया वह साहब कौन है जो सबके पार है ? तुम किसका ध्यान करते हो ? मुक्ति कहाँ है ? आप कहाँ सुरति लगाते हो ? किस तरहसे यमयातनासे बच सकते हैं ? मुझसे पृथक् २ वर्णन कीजिये” जब आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव जो जीवोंके उद्धार करनेवाले हैं उनको कुछ समझतेही नहीं तो राजाको क्या उपदेश करोगे । चाहे कोई कितनाही करे परन्तु विष्णुकी भक्ति बिना मार्ग नहीं मिल सकता । नामदेवके इतने कहनेके पीछे कबीर साहब बोले कि, हे नामदेव ! जैसे तुम भूले हो मुझे वैसा न समझो “निर्गुण पुरुष सबसे न्यारा है । उसीका सगुण नाम विष्णु है जिसका कि, वेद गुण गाते हैं, ऋषि, मुनि, सब ध्यान धरते हैं पर पार नहीं पाते, सद्गुरुकी कृपासे कोई सन्त जान सकता है ।” तुम जड़ मूर्तिकी पूजा करते हो यह मूर्ति भी उसी की है जो उत्पन्न करता और खा जाता है । इतनेमें सभाके उठनेका समय हुआ, सब लोग अपने अपने घरको गए ॥

दूसरे दिन राजाने शिकार खेलनेकी तैयारी की । “तब राजा अस वचन उचारा, हम संगसाहिब चलो शिकारा ।” आवश्यक समान लेकर रवाना हुआ, कबीर साहब तथा बहुतेक सेनाभी साथमें थी । उस दिन राजाके बहुत परिश्रम करनेपर भी कोई आखेट न मिला, सब बहुत दूर चले गये । थककर पीछे फिरने पर राजाने देखा कि, सब सेना तृष्णासे पीड़ित होरही है, राजाने आज्ञा दी कि, जलका खोज करो कितने लोग तो पीछे भाग गये, कितने इधर उधर झूल गये, कितने जनोंने थककर राजासे आके कहा—महाराज ! पानीका पता कहीं नहीं मिलता, हम लोगोंके प्राण जाते हैं; इतना कह कर सब व्याकुल हो गये यह देख राजा बहुत घबड़ाया, उस समय कबीर साहबने अपनी शक्तिसे नानाप्रकारके सुगन्धित फूलों तथा मिष्ठ सुरत फलोंसे लदे वृक्षों सहित एक ऐसा उपवन प्रगट