कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकिया, जिसके कि बीचमें बहुत शुद्ध मीठे जलका एक सरोवर भरा हुआ था, मन्द सुगन्ध वायु चल रही थी जहाँ जानसे आत्मा प्रफुल्लित होती थी । फिर साहबने राजासे कहा ऐ राजा ! यहाँसे उत्तर की ओर देखो। कौसी उत्तम फूलवारी और ठण्डे जलसे भरा हुआ सरोवर दिखाई पड़ता है । राजाने कहा, महाराज ! आप यह क्या कहते हैं ? सहस्रों वर्षसे यह बात प्रसिद्ध है । मुझे भी प्रायः अनुभव हुआ है कि, इस पहाड़पर कहीं जल नहीं है आप ऐसी बात न कहिये जो सुनेगा वह हँसेगा एवं कहेगा कि, सद्गुरु झूठ बोलते हैं । उस समय राजाके प्रधानने राजाको समझाया कि, महाराज ! सद्गुरुके बचनको झूठ न जानिये, जो कहते हैं सो कीजिये। इसपर राजा सद्गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके सेना सहित इधर उधर जल ढूंढ़ता हुआ उत्तरकी ओर चलता हुआ एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ सद्गुरुके बताये हुये उपवन और सरोवर सुशोभित थे ! वहाँ आम, दाड़िम, केला आदि नाना प्रकारके फलोंसे लदे हुये वृक्ष लगे हुए थे ! जिन्हें कि देखतेही चित्त प्रफुल्लित हो उठता था बार बार सद्गुरुको दण्डवत् नमस्कार करता हुआ धन्यवाद देने लगा कहा कि, हे सद्गुरु ! मेरा अपराध क्षमा करो, भविष्यतमें आपका बचन कभी उल्लंघन न करूँगा । सद्गुरुकी आज्ञा पाय सेना सहित फल फूल इत्यादि खाय जल पीकर शान्त हुआ 'तृषा सबनकी बुझिगई ऐसा निर्मल नीर' कबीर साहबने कहा कि, हे राजन् ! अब चलो, तब राजा कबीर साहबको हाथीपर सवार कराकर आपभी सवार हो सेना सहित राजधानीको चला । थोड़ी दूर आगे जाकर पीछे फिरके देखनेसे उसी स्थानपर जहाँ कि तलाव और बाग था, धूलही उड़ती हुई दिखाई दी ।
धन्य कबीर सरोवर रची, छूतहिं लीन जवाय ॥
जहंको जलले आयऊं, तहंको दीन पठाय ॥
सब लोग नगरमें पहुँचे, राजाने अन्तःपुरमें जाकर रानीसे आखेटका सब वृत्तान्त कहा । रानीने अत्यन्त श्रद्धा प्रेमके साथ सद्गुरुको दण्डवत् किया, राजाने साहबकी दीक्षा ली । पीछे राजाने सद्गुरुसे कहा कि, हे प्रभु ! मुझे अपना लोक दिखाइये । राजाको लेकर सद्गुरु सत्यलोकको चले, मार्गमें यमदूतोंने आकर राह रोकी और कहा कि, आप राजाको लेकर कहाँ चले ? कबीर साहबने दूतोंको समझाया कि, यह जीव सत्य पुरुषका स्वरूप पागया है । इतना सुनतेही यमदूत भाग गये, तब राजा वीरसिंहको सद्गुरु सब लोक दिखाने लगे, सत्य लोकको लेगये, वहाँ सत्यपुरुषका दर्शन कराया । राजा वहाँकी आनन्दशोभाको देखकर अत्यन्त मोहित होगया, यहाँ तक कि, जब सद्गुरुने उसे पीछे चलनेको