कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextलय) गई। मीराका पूर्ण प्रेम तो गिरधरलालसे था ही इस कारण साधुओंकी सेवा करना तथा गाना नाचना यही उसका मुख्य काम था। मीराकी यह दशा देखकर राना उदयपुरने बहुत मना किया कि, मीरा ! तू मेरी पत्नी होकर साधुओं में न जायाकर, इसमें मेरी नाम हँसाई होती है। यद्यपि रानाजीने बहुतेरा मना किया पर मीराने एक भी नहीं मानी साधुओंके पास आने जानेसे नहीं रुकी। अन्तमें रानाने मीराकी भक्तिसे घबराकर विषका प्याला भेजा एवं कहलाया कि, यह ठाकुरका चरणामृत है, तू पी तेरा कल्याण होजायगा। मीरा उसे प्रसन्नतापूर्वक * पीगई, वह (विष) अमृत होगया, अब तो मीरा और भी अधिक प्रेम और उत्साहसे नाचने गाने लगी, भगवान्की भक्ति करने लगी। फिर रानाने साँप भेजा वह साँप जब मीराके समीप पहुँचा उसने गलेमें डाल दिया जिससे वह फूलकी माला बनगया। फिर रानाने शेर छोड़ा वह भी मीराके सामने माथा टेके कर चला गया। मीराने देखा कि, अब मुझको रानाके घर रहना उचित नहीं है तब तीर्थके निमित्त निकल गई। मीराके जानेके पीछे उदयपुरके देशमें काल पड़ गया, लोग भूखसे मरने लगे, रानाने मीराको बुलाना चाहा, अपने कारबारियोंको भेजा कि, मीराको कह सुनकर ले आवें। कारबारियोंने बहुत कुछ कहा पर मीराने एकभी न सुना और कहा कि, अब मुझे भगवान् गिरधर लालके चरणोंको छोड़कर कहीं भी जाना नहीं चाहिये।
इस मीराने भक्ति तथा प्रेमका कर्तव्य पूर्णतया पालन किया। इसलिये उसको कबीर गुरु मिले। वह सत्यगुरुका हंस होकर जब परमधामको चली उस समय वह सशरीर विलोपित हो गई। किसीको तनिक भी सुधि नहीं मिली कि, मीरा कहाँ चली गई। श्रीकृष्णकी उपासना करनेमें जो परम प्रेम प्रगट किया तो उसको सत्यगुरु मिल गये और उसका काम पूरा हो गया। जिसको पति माना था अपने शरीरको भी उसीमें मिला दिया।
- मीराने विषका प्याला पीते समय जो भजन गाया था, पाठकगणके विनोदके लिये यहाँ लिखता हूँ—रानाजी जहर दियो मैं जानी ॥ जिन हरि मेरो नाम निबेज्यो; छन्यो दूध अरु पानी। जब लगि कंचन कसियत नाही होत न बाहिर वानी ॥ अपने कुलको परदा करियो, हम अवला वीरानी ॥ श्वपच भक्त धारौं तन मन, जैहों हौं हरि हाथ बिकानी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, सन्त चरण लपटानी ॥ १ ॥ हमारे मन राधा श्याम वसी ॥ कोई कहे मीरा भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ॥ खोलिके घूँघट पारिकैं गाती, हरि ढिग नाचत गली ॥ बुन्दावनकी कुंजगलिनमें भाल, तिलक उर लसी ॥ विषको प्याला रानाजी भेज्यो, पीवत मीरा हँसी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, भक्तिमार्गमें फँसी ॥
सोरठा—मीरा यह पद गाय, विष प्याला पी हरि भज्यो।
गयो सो गरल विहाब, नशा न कीन्हयो नैकहू ॥