कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextशाह सिकन्दर लोदीकी दीक्षा ।
शाहसिकन्दरने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे। जब उसको निश्चय होगया कि, यह कबीर साहब पृथ्वी तथा आकाशके बीच सच्चे गुरु हैं दूसरा कोई नहीं, तब वह सत्यगुरुकी शरण लेकर संसार सागरके पार उतर गया । शाह सिकन्दर तो पहलेही कौतुक पर विश्वास कर चुका था। फिर उसने इतने कौतुक देखे तब उसका विश्वास और भी दृढ़ हो गया । उसको भली भाँति मालूम हो चुका कि, कबीरही स्वयम् सत्यपुरुष परमात्मा हैं । सिवा कबीरके दूसरा कोई नहीं है इस बादशाहका विश्वास जैसा सच्चा हुआ वैसाही उसको फल मिला अर्थात् सत्यगुरु का प्यारा भक्त हुआ सच्चे धामका अधिकारी हुवा । कमाल बोधमें लिखा हुवा है कि —
रमैनी — शाह सिकन्दर शरना^१^ लीना । चौकाकर^२^ परवाना^३^ दीना ॥
भय मुरीद^४^ कबीरके आई । ताते सद्गुरु नाम फिराई ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली आये । मुल्ला काजी वचन सुनाये ॥
शेख तक्री है शाहको पीरा । सब मिली कियो उन्हींसे जोरा^५^ ॥
ऐसा इल्म शाहको दीना । मुरीद तुम्हारे बहका^६^ लीना ॥
चले हैं काजी शाह दबार । शाहसे पूछे ज्ञान विचारा ॥
काजी मुल्ला वचन ।
कहो शाह तुम कह मत^७^ पाई । कैसे अपना इसिम फिराई ॥
चार बिहिश्त^८^ अल्ला फ़रमाये । उनको छोड़ आगे कहँ जावे ॥
दीनका मारग अहदसे^९^ पाई । सो तुम कैसे दीन मिटाई ।
दीन दुनीका^१०^ तुम सरदारू । कैसे भई अकिल तुमारू^११^ ॥
काफ़िरके^१२^ मुरीद तुम होई । दीनके घर कहँ टट परोई ॥
शाह सिकन्दर वचन ।
शाह कहे काजी और मुलाना । झूठी दीन दुनी फरमाना^१३^ ॥
दीनका जो घर उरे ले आई । बिन जाने तुम असल बताई ॥
किन वैकुण्ठ बिहिश्त बनाई । वेद कितेब^१४^ कहाँ ते आई ॥
कहो खुदाय कौन घर बासा । तन^१५^ छूटे कहँ होये निवासा ॥
साखी — सुने सुने तुम सब कहो, नहिं देखा दीदार^१६^ ।
पीर औलिया देखि सब, सद्गुरु^१७^ खेल अपार^१८^ ॥
१ शरण, २ चौकापूर्वकदीक्षा देकर, ३ सत्यलोकका ओडार, ४ सेवक, ५ आग्रह, ६ भुला, ७ बुद्धि, ८ स्वर्ग । ९ शर्त, १० संसार, ११ तुम्हारी, १२ ईश्वर, न माननेवाले, १३ कथन, १४ किताब, १५ शरीर, १६ दर्शन, १७ कबीर, १८ अनगिनत,