कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसर्वाङ्ग अङ्गकी साखी ॥ १० ॥
सा० — गरीब-सुलतानाके तीर लगा, बलख बुखारा त्याग ।
जिन्दाका चोला दिया, सद्गुरु सत्य बैराग ॥ ११ ॥
गरीब-बहुरङ्गी बिरियामहै, मिला नीरमें नीर ॥
गोरखके मस्तक गहे, अदली अदल कबीर ॥
गरीब-ऋषभ देवके आये, करुणामय करतार ।
नौ योगेश्वर पद रमें, जनक विदेह उरधार ॥
भागवतके ग्यारहवें स्कन्धके दूसरे अध्यायमें लिखा है कि, मनुकी संतानमें ऋषभदेव नामक एक राजा हुआ । उसके एकसौ पुत्र थे । उनमेंसे एकका नाम भरत था, जिसके भी नामसे यह भरतखण्ड प्रसिद्ध हुआ है । उन्हीं-मेंसे नौ परम योगीश्वर तथा ज्ञानी हो गये हैं । उन्हींने राजा जनकको ज्ञानोपदेश किया था । उन्हीं नौ योगेश्वरोंका वृत्तान्त गरीबदासजी लिखते हैं कि, ये नौ योगीश्वर राजा जनक सहित करुणामय कबीर साहबके कृपापात्र शिष्य होकर परमधामको सिधार गये । जिनकी कि, लोग आज कथाएँ गाते हैं ।
अचल अङ्गकी साखी २७॥
सा० — गरीब-नारद सनकादिक सही, बज्र दण्ड वैराग ॥
जोगजीत सद्गुरु मिले, उपजा अति अनुराग ॥ ५१ ॥
गरीब-दुर्वासा और गरुड़को, दीन्हा ज्ञान अपार ।
दृष्टि खुली निज ध्यानसे, फिर नहिं लगे लगाए ॥ १० ॥
मुहम्मदकी जो चली है, रूह, दरगह देखे दूबर दूह ।
पीर कबीरा जिन्दा ख्याल, मारग मंतर तारंग बाल ॥
ये कबीर साहिबके बारह पन्थोंमेंसे अन्तिम पन्थके आचार्य थे, ये सत्य-गुरुके हुक्मके मुताबिक जगह जगह उपदेश देते हुए वृन्दावन पहुंचकर लोगोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश सुनाने लगे । वहाँके लोगोंने आपसे कहाकि, वैष्णवोंकी तरह भगवान्की पूजा करके फिर हमें उपदेश दोगे तो मानेंगे नहीं तो हमारे दिलोंमें आपके उपदेशके लिये स्थान नहीं है । गरीबदासजीने कहा कि, अब मैं हृदयमें ही ध्यान किया करता हूँ वही मेरी मूर्तिपूजा है । मैं, मूर्तिपूजाको बुरा नहीं । कह रहा हूँ मेरी श्रद्धा पूजामें है पर मैं इसे ज्ञानपूर्वक चाहता हूँ, पर भक्तिके दीवाने व्रजवासियोंने उनकी बातको स्वीकार नहीं किया आप भी व्रजवासियोंकी अचल भक्ति देखकर प्रसन्न हो स्थानान्तरित होगये । उनकी पारस अंगकी कुछ साखियोंको यहाँ उद्धृत करते हैं ।