भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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साखी - काशीपुरको कसद किया, उतरे अधर अधार ।
मोमिनका मुजुरा हुआ, जङ्गलमें दीदार ॥
गरीब-कोटि किरन शशि भानु सुधि, आसन अधर विमान ।
परसत पूरण ब्रह्मको, शीतल पिण्ड औ प्रान ॥
गरीब-गोदलिया मुख चूमके, हेम रूप झलकन्त ।
जगर मगर काया करे, दमके पद्म अनन्त ॥
गरीब-काशी उमड़ी गुल भया, मोमिनका घर घेर ।
कोई कह ब्रह्मा विष्णु है, कोई कहें इन्द्र कुबेर ॥
गरीब-कोई कह वरुण धरमराय है, कोइ कोइ कहता ईश ।
सोलह कला सुभान गति, कोई कहें जगदीश ॥
गरीब-भगति मुक्ति ले ऊतरे, मेटन तीनों ताप ।
मोमिन घर डेरा लिया, कहें कबीरा वाप ॥
गरीब-दूध न पीवे न अन्न भखे, नहिं पलने झूलन्त ।
अधर आसन है ध्यानमें, कमल खिला फूलन्त ॥
गरीब-कोई कह छल ईश्वर नहीं, कोई किन्नर कहलाय ।
कोई कहें गुण ईशका ज्यों ज्यों मारिये साय ॥
गरीब-काशीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द ।
ऐसे दूल्हा ऊतरे, ज्यों कन्या बरबिन्द ॥
गरीब-खल्क मुल्क देखन गया, राजा परजा रीति ।
जम्बूद्वीप जहानमें, उतरे शब्द अतीति ॥
गरीब-दुखी कहें यह देह है, देव कहें यह ईश ।
ईश कहें परब्रह्म है, पूरन विश्वे बीस ॥
गरीब-काजी गये कुरान ले, धर लड़केका नौउ ॥
अच्छर अच्छरमें फुरे, धन्य कबीर बल जाऊँ ॥
गरीब-सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।
काशीके काजी कहें गयी दीनकी टेक ॥
गरीब-शिव उतरे शिवपुरीसे, अविगत वदन विनोद ।
महके कमल खुशी भया, लिया ईशको गोद ॥
गरीब-नजर नजरसे मिल गयी, किया दर्श परणाम ॥
धन्य मोमिन धन्य पूरना, धन्य काशी निष्काम ॥
गरीब-सात बार चर्चा करे बोले बालक बैन ।

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