कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 633, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिव सो कर मस्तक धन्यो, ला मोमिन यक धेनु ॥
गरीब-अनब्यावरको दुहतही, दूध दिया ततकाल ।
पीयो बालक ब्रह्म गति, वहाँ शिव भये दयाल ॥
गरीब-कष्ट मानुषके जब भई, नित दुनिया वर देहि ।
चरण चले तत पुरीमें, यहि शिक्षा निति लेहि ॥
रामानन्द स्वामी और कबीर, साहब की बातेंलाप की साखी ।
गरीब-भक्ति द्रावड देशथी, यहाँ नहीं एक विरञ्च ।
ऊत भूतको घ्यावना, पाखण्ड और परपञ्च ॥
गरीब-रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मँझार ।
देश द्राविड़ छाड़िके, आये पुरी विचार ॥
गरीब-योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता, सकल शरीर ।
तिरवेणीके घाटमें अटक रहे बलवीर ॥
गरीब-तीर्थ बरत एकादशी, गंगोदक अस्नान ।
पूजा विधि विधानसो, सर्वकलासों गान ॥
गरीब-करे मानसी सेवनित, आत्म तत्वको ध्यान ।
षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥
गरीब-चौदह सौ चले किये, काशीनगर मँझार ।
चार सम्प्रदा चलत हैं, और है बावन द्वार ॥
गरीब-पांच बरसके जब भये, काशी माहिं कबीर ।
दास गरीब अजीब कला, ज्ञान ध्यान गुण थीर ॥
गुल भया काशीपुरी, में अटपट वैन विहंग ।
दास गरीब गुणी थके, सुनि जुलहा परसंग ॥
रामानन्द अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश ।
दास गरीब विलम्ब ना, ताहि नवावत शीश ॥
रामानन्दको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाय ।
दास गरीब दरस भये, पैयन लगी जो लाय ॥
पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन ।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये परवीन ॥
आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त ।
दास गरीब उलझ छबि, अधर डाक कूदन्त ॥
कौन जाति कुल पन्थ है, कौन तुम्हारा नाउँ ।